दूर का मकान- ज्योतिराज दासलंबे
इंतज़ार के बाद आखिरकार मुझे एक नौकरी मिल ही गई। पर समस्या यह थी कि दफ़्तर मेरे घर से काफी दूर था। लिहाजा, एक मध्यमवर्गीय परिवार के बेटे के नाते मैंने अपने कार्यस्थल के आसपास ही सस्ते में एक छोटे से मकान की तलाश शुरू कर दी। ढूँढते-ढूँढते मुझे एक ऐसा मकान मिला जो दफ़्तर से लगभग तीन किलोमीटर दूर था और काफी बड़ा भी था। अचरज की बात यह थी कि उसका किराया अप्रत्याशित रूप से बहुत कम था। किसी शहरी इलाके में इतना बड़ा मकान इतने सस्ते दाम पर मिल जाना मेरी कल्पना से परे था।

घर के आसपास दूर-दूर तक किसी आबादी का नामोनिशान तक नहीं था, मगर मुझे इससे कोई खास ऐतराज नहीं था। मकान मालिक के कहे अनुसार, अगले ही दिन मैं अपना कुछ सामान लेकर वहाँ पहुँच गया। मेन गेट के पास खड़े करीब ६०-६५ वर्ष के एक नाटे और तोंद वाले सज्जन शायद मेरा ही इंतज़ार कर रहे थे—वही मकान मालिक थे। मुझे देखते ही उन्होंने गेट खोल दिया। मैंने अपनी मोटरसाइकिल अंदर बढ़ाई, नीचे उतरा और हेलमेट उतारकर मकान को गौर से देखा। यह बिल्कुल कल देखी तस्वीर जैसा ही था। दीवारें काई जैसी काली-हरी थीं, बाउंड्री की ईंटें बदरंग लाल-काली हो चुकी थीं और जगह-जगह से खिसक भी गई थीं। बाउंड्री के चारों ओर जंगली झाड़ियाँ उगी थीं, पर मेरे रहने के लिहाज से सब ठीक था। मकान मालिक मुझे लेकर अंदर दाखिल हुए। मकान में दो बेडरूम, एक किचन, एक डाइनिंग एरिया और सीढ़ियों के पास बाथरुम था। कमरे दिखाने के बाद वे मुझे बाहर ले आए और पास ही लगे हैंडपंप की तरफ इशारा करते हुए बोले— “फिलहाल पानी का ज़रिया यही है।”मुझे इससे भी कोई ऐतराज नहीं था। ठीक उसी वक्त सामान वाली गाड़ी भी आकर रुक गई।जब सारा सामान घर के अंदर रखा जा चुका, तब मैंने घड़ी देखी।
दफ़्तर जाने में अभी भी ४० मिनट बाकी थे।मैंने मकान मालिक से कहा— “चलिए, थोड़ी चाय पी लीजिए।”उन्होंने विनम्रता से मना करते हुए कहा— “नहीं-नहीं, रहने दीजिए। आपको तकलीफ़ देने की ज़रूरत नहीं है, वैसे भी आपके दफ़्तर के लिए देर हो रही है।”— “लेकिन किराया?”— “अरे नहीं-नहीं, अभी देने की कोई जल्दी नहीं है। महीने के अंत में दे दीजिएगा। अच्छा, अब मैं चलता हूँ।”— “जी ठीक है।”वे काफी दूर आगे बढ़ चुके थे, तभी कुछ याद आते ही अचानक मेरे पास वापस लौटे और बोले— “एक बात कहनी थी।”— “हाँ-हाँ, कहिए ना।”— “मैं कह रहा था कि रात को सोने से पहले सारे खिड़की-दरवाजे अच्छी तरह बंद कर लीजिएगा, फोन हमेशा अपने पास रखिएगा और…”— “और?”— “नहीं-नहीं, कुछ नहीं। अच्छा, चलता हूँ।”वे चले गए। उस सज्जन के चेहरे पर सदा एक मुस्कान रहती थी, मगर वह बेहद बनावटी और रहस्यमयी लगती थी। उनकी बात पर ज़्यादा ध्यान न देते हुए मैंने दरवाजे पर ताला जड़ा और दफ़्तर के लिए निकल पड़ा।रात के सात बज रहे थे। दफ़्तर खत्म करने के बाद बाज़ार से रात के भोजन का सामान और कुछ ज़रूरत की चीजें खरीदकर मैं लौट रहा था। अभी से ही पूरा रास्ता बिल्कुल वीरान हो चुका था। चारों ओर हल्की-हल्की तूफानी हवा चल रही थी और बारिश के पूरे आसार नज़र आ रहे थे। घर के पास पहुँचकर मैंने आसपास का मुआयना किया। चारों तरफ स्याह, घना अंधेरा फैला था। गाहे-बगाहे आसमान में बिजली कौंध जाती थी। गेट का ताला खोलकर मैंने फोन की फ्लैशलाइट जलाई और अंदर दाखिल हुआ। मोटरसाइकिल एक तरफ खड़ी की और घर के भीतर कदम रखा। गनीमत थी कि अभी बिजली मौजूद थी। मैंने बत्तियाँ जलाईं, फोन को चार्जिंग पर लगाया और बाहर का बल्ब भी जला दिया। फिर हैंडपंप से बाल्टी में साफ़ पानी भरकर बाथरुम ले जाने लगा। पानी पीकर मुझे अहसास हुआ कि मकान मालिक सच ही कह रहे थे—पानी में आयरन की मात्रा एकदम सही थी। इसके बाद मैं जल्दी से नहाकर बाहर निकला ही था कि अचानक घर की सारी बत्तियाँ बुझ गईं। और ठीक अगले ही पल, कड़कड़ाती आवाज़ के साथ ज़ोरदार बिजली कौंधी, जिसके तुरंत बाद तूफानी हवाएं बहने लगीं। खुली खिड़कियां सन्नाटे को चीरती हुई सशब्द बंद हो गईं। मैं समझ गया कि अब पूरी रात बिजली आने की कोई गुंजाइश नहीं है। मैंने थाली में भुना हुआ मांस और पराठे निकाले और रात का भोजन निपटाया। मगर न जाने क्यों, एक अजीब सी बेचैनी मुझे घेरे जा रही थी—ऐसा लग रहा था जैसे अंधेरे से कई आँखें टकटकी बाँधे मुझे ही घूर रही हों।थोड़ा टहलने के बहाने मैंने छत पर जाने का फैसला किया, इसी बहाने छत का मुआयना भी हो जाता। सो, मैंने सीढ़ियों की तरफ कदम बढ़ा दिए।छत पर पहुँचकर देखा तो पूरा मंज़र घने अंधेरे की आगोश में समाया हुआ था। मैंने फ्लैशलाइट चारों तरफ घुमाई। छत के फर्श पर ज़माने से काली काई जमी हुई थी। ठंडी, तूफानी हवा के झोंके चल रहे थे। थोड़े संकोच के साथ मैंने छत पर कदम रखा और बिल्कुल आखिरी छोर पर जाकर खड़ा हो गया। उस सर्द हवा ने बदन को छूकर एक सिहरन भर दी। मैंने आँखें मूँद लीं। तभी अचानक, किसी ने पीछे से मुझे ज़ोरदार धक्का दे दिया! अगर ज़रा सा भी संतुलन बिगड़ता तो मैं सीधे नीचे जा गिरता, और शायद फिर कभी मेरी आँखें न खुलतीं। मैं छिटककर दूर जा गिरा। बिजली की कौंध से एक सेकेंड के लिए चारों ओर उजाला फैल गया, पर मुझे वहाँ कोई नज़र नहीं आया। शायद झपकी आ जाने की वजह से मुझे ऐसा अहसास हुआ होगा। तभी मेरे शरीर पर पानी की एक बूँद गिरी—समझ गया कि मूसलाधार बारिश शुरू होने में अब ज़्यादा देर नहीं है। सीढ़ियों से नीचे उतरते-उतरते तेज़ बारिश शुरू हो गई। बाथरुम में पैर धोकर मैं बेडरूम में आ गया। दिनभर की थकान के बाद अब और जागने का हौसला नहीं था। खाट पर बिस्तर बिछाया और लेट गया। बाहर बारिश और हवा का शोर सुनते-सुनते मेरी आँखें मूँदने लगीं।अचानक मैं हड़बड़ाकर बिस्तर पर उठ बैठा। ज़ोरों की प्यास लगी थी। सिरहाने के पास फोन टटोलते ही मेरा हाथ किसी बर्फ जैसी ठंडी चीज़ से टकराया। मैंने झट से फोन की फ्लैशलाइट जलाई और उस तरफ घुमाई—मगर वहाँ कुछ भी नहीं था। फोन की स्क्रीन पर देखा तो रात के ठीक १२:३० बज रहे थे। पानी की बोतल, जो मैंने खाट के नीचे रखी थी, उसे उठाने के लिए झुका तो देखा कि वह किसी वजह से लुढ़क गई थी और उसका ढक्कन खुलकर सारा पानी फर्श पर बह चुका था। झल्लाकर जैसे ही मैं बोतल उठाने लगा, मुझे लगा कि खाट के नीचे कोई मौजूद है! अचानक फ्लैशलाइट का रुख दूसरी तरफ मुड़ गया। जब मैंने दोबारा रोशनी उस तरफ की, तो मेरे होश उड़ गए—बोतल वहाँ से गायब थी! तो क्या सचमुच खाट के नीचे कोई है? हिम्मत जुटाकर मैंने धीरे-धीरे नीचे झाँका। नहीं, वहाँ कोई नहीं था। बोतल शायद लुढ़ककर दूसरी तरफ चली गई थी। सो, मैं बोतल उठाकर दरवाजे की तरफ बढ़ गया।बाहर आकर देखा तो बारिश की रफ्तार कुछ धीमी पड़ चुकी थी। भीगते हुए मैंने हैंडपंप से बोतल में पानी भरा—न जाने क्यों, पानी इस बार कुछ ज़्यादा ही गाढ़ा महसूस हो रहा था। फिर छत की छज्जी के नीचे आकर जैसे ही मैंने बोतल से घूंट भरने के लिए मुँह लगाया, मुझे एक तीव्र, सड़न भरी और लोहे जैसी गंध आई। फोन की फ्लैशलाइट जैसे ही बोतल पर पड़ी, मेरा कलेजा हलक को आ गया! मैंने तुरंत बोतल दूर फेंक दी, क्योंकि उसमें मौजूद तरल का रंग गहरा लाल था—इतना गहरा लाल कि वह हैंडपंप का पानी तो हरगिज़ नहीं हो सकता था। जो गाढ़ा तरल मेरे हाथों पर लगा था, क्या वह पानी था? मैंने अपने दिल को लाख समझाया, पर हाथ को नाक के पास लाकर सूँघने की हिम्मत न जुटा सका। बारिश के पानी में हाथ धोकर मैं कमरे में लौट आया। अब पानी पीने की इच्छा खत्म हो चुकी थी। मैं बाथरुम की तरफ बढ़ा, मगर दरवाजे के पास पहुँचकर ठिठक गया—लगा जैसे सीढ़ियों पर कोई चुपचाप खड़ा है। मैंने फ्लैशलाइट घुमाई, पर वहाँ कोई नहीं था।मैं बाथरुम से बाहर निकलने ही वाला था कि मेरी नज़र बाथरुम की खिड़की पर पड़ी। खिड़की पर एक इंसान जैसी काली आकृति उभर आई थी। मेरे रोंगटे खड़े हो गए। मैं बदहवास सा बाथरुम से बाहर भागा और ठीक उसी पल मेरी फ्लैशलाइट बंद हो गई! एक भीषण, सड़न भरी बदबू मेरी नाक से टकराई। मैं नाक बंद करके आगे बढ़ने ही वाला था कि देखा—सीढ़ियों पर एक छाया-मूर्ति सी खड़ी है। अंधेरे में मैं बेबसी से उसकी तरफ टकटकी बाँधे देखता रहा, मेरी आँखें हट ही नहीं रही थीं। तभी बिजली के एक भीषण धमाके ने मुझे चौंका दिया और मैं बेडरूम की तरफ बदहवास होकर दौड़ा। एक अनजाने खौफ ने मुझे अपनी ज़द में ले लिया था। मैं बिस्तर में मुँह ढककर दुबक गया। बाहर बारिश का शोर बढ़ चुका था। आँखें मूँदे लेटे-लेटे मैंने महसूस किया कि कमरे का तापमान तेज़ी से गिर रहा था। मुझे कँपकँपी छूटने लगी। मैंने आँखें खोलकर दरवाजे की तरफ देखा। कुछ देर बाद जब आँखें अंधेरे की आदी हुईं, तो दरवाजे के पास लगे आईने में एक छाया-आकृति नज़र आई। धुंधली होने के बावजूद मैं साफ़ समझ पा रहा था कि वह आईने के ज़रिए मुझे ही घूर रही है। मैंने अपनी पूरी हिम्मत जुटाकर फोन टटोला और फ्लैशलाइट जलाई—रोशनी पड़ते ही मेरा दिल उछलकर गले में आ अटका! आईने में एक भयानक महिला के चेहरे की परछाईं थी, जो मेरी खाट के ठीक पीछे खड़ी थी और कान तक फैली एक वीभत्स मुस्कान के साथ मुझे ताक रही थी! उसके पूरे चेहरे पर काले-काले धब्बे और गहरे घाव थे, आँखों की पुतलियाँ मटमैली सफ़ेद थीं और उसके दाँत… उफ़! कितने नुकीले और खौफनाक! मेरे हाथ से फोन छूटकर गिर गया और ठीक उसी पल एक महीन, डरावनी हँसी का स्वर गूँज उठा। मैंने अपनी बची-कुची ताकत समेटी और डाइनिंग एरिया की तरफ पागलों की तरह दौड़ा। कुछ सूझ नहीं रहा था, सो मैं किचन में जा घुसा और दीवार से पीठ सटाकर खड़ा हो गया। पर जैसे ही मेरी नज़र सामने गई, देखा कि सीमेंट के स्लैब के कोने पर, जहाँ मैंने खाने के बाद मांस की हड्डियाँ फेंकी थीं, वहाँ एक आकृति झुकी हुई कुछ कर रही थी। फिर हिम्मत जुटाकर मैंने फ्लैशलाइट जलाई, और इस बार तो मेरी धड़कनें ही थम गईं! वहाँ एक औरत बैठी थी—शरीर पर काले दाग और सड़न भरे घाव, बिखरे हुए लंबे बाल और फटी-चीरी काली साड़ी। मेरे मुँह से एक हल्की सी आवाज़ निकल गई, और उसी क्षण वह औरत मेरी तरफ घूम गई। उसका चेहरा देखकर मेरे रोंगटे खड़े हो गए—चेहरे पर ज़ख्मों के निशान, असामान्य रूप से लंबी जीभ, नुकीले काले दाँत और पुतलियों की जगह मुकम्मल सफ़ेदी! वह बची हुई हड्डियों को चटकारे लेकर चाट रही थी। मेरी फ्लैशलाइट टिमटिमाकर बुझ गई। ठीक उसी वक्त सामने से एक तीखी, चीरती हुई चीख उभरी—लगा जैसे मेरा दिल सीना फाड़कर बाहर निकल आएगा। अचानक वह औरत मुझ पर झपट पड़ी! और ठीक उसी पल, जैसे मेरे जिस्म में ताकत लौट आई। मैं बदहवास होकर किचन से बाहर भागा—अब और नहीं, इस घर में एक पल भी नहीं! पीछे से उस औरत की खौफनाक चीखें गूँज रही थीं। मैं अंधेरे में ही दरवाजा ढूँढकर बाहर निकल आया। बाहर बारिश और हवा का तांडव जारी था। मेन गेट खोलकर मैं कच्चे रास्ते पर भागा—शुक्र था कि मैंने ताला नहीं लगाया था। कीचड़ भरे अंधेरे रास्ते पर मैं बेतहाशा दौड़ता रहा। पीछे से वह रोंगटे खड़े कर देने वाली चीखें और अट्टाहास पीछा कर रहे थे। मैं फिसलकर गिर पड़ा। मुड़कर देखा तो वह औरत चारों हाथ-पैरों के बल किसी जानवर की तरह मेरी तरफ झपट रही थी! मैंने अपने वजूद की आखिरी ताकत झोंक दी और फिर से भागने लगा। आखिरकार आगे कुछ घर नज़र आए। मैं चिल्लाने लगा— “कोई है? बचाओ! बचाओ!” और फिर धप्प से रास्ते पर गिर पड़ा… उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं।जब आँख खुली, तो देखा कि मैं एक खाट पर लेटा हूँ और मेरे आसपास चार आदमी खड़े हैं। उठने की कोशिश की तो पैर में मरोड़ उठती हुई पीड़ा हुई। एक व्यक्ति ने पूछा— “अब आपकी तबियत कैसी है?”— “कल रात मेरे साथ क्या हुआ था? और जो कुछ मैंने देखा…”मेरी बात पूरी होने से पहले ही दूसरे आदमी ने टोकते हुए कहा— “हम सब जानते हैं, आप आराम कीजिए।” फिर चारों एक-एक करके बताने लगे।— “कल रात जब आप मदद के लिए चिल्लाते हुए यहाँ आए, तो आसपास के लोग टॉर्च और लाठियां लेकर बाहर निकल आए। फिर हम आपको यहाँ लाए और…”— “उस मकान का सच यह है कि कई साल पहले वहाँ एक परिवार रहता था।
एक दिन अचानक किसी ने पूरे परिवार की बेरहमी से हत्या कर दी और लाशों को आग के हवाले कर दिया।”— “पुलिस की लंबी छानबीन के बाद भी जब कुछ हासिल नहीं हुआ, तो केस बंद कर दिया गया। उस मकान मालिक का बेटा ही अब उस जायदाद का मालिक है।”— “जिस मकान में उसके अपनों का कत्लेआम हुआ था, वहाँ वह खुद नहीं रहना चाहता था। इसलिए उसने अंदर रंग-रोगन करवाकर उसे किराये पर चढ़ाना चाहा। तब से कई लोग आए, मगर कोई भी एक-दो दिन से ज़्यादा टिक नहीं पाया।”— “सब आपकी तरह ही जान बचाकर भागे थे। उनके साथ जो खौफनाक हादसे हुए, वे हम वर्षों से सुनते आ रहे हैं, इसलिए आपसे सुनने की ज़रूरत नहीं है।”— “एक बार एक सज्जन आए थे, जो थोड़ा तंत्र-मंत्र जानते थे। उन्होंने जब हमसे यह सब सुना, तो एक महायज्ञ करने की बात कही। मकान मालिक ने भी कोई ऐतराज नहीं किया। हमने यज्ञ के लिए कुछ सामान भी जुटा दिया था। वह अमावस की रात थी। हम चारों भी उस रात वहाँ मौजूद थे। उन्होंने देर रात यज्ञ शुरू किया। यज्ञ की सामग्री बेहद अजीब और खौफनाक थी—भैंसे और घोड़े का खून, इंसानी खोपड़ी, पोखरे की काली मिट्टी और न जाने क्या-क्या। उनके वस्त्र भी गहरे लाल रंग के थे। मगर यज्ञ के बीच ही हवन कुंड में न जाने क्या आकर गिरा, और वे सिर पर हाथ रखकर हताशा में डूब गए।”— “फिर क्या हुआ?”— “फिर क्या, उन्होंने हमें तुरंत घर लौटने को कहा और अगले ही दिन खुद भी बोरिया-बिस्तर समेटकर चले गए। उसके बाद से उस घर में कोई नहीं आया।”उनकी बातें सुनकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं।— “आप शहर के लोग इन सब बातों पर यकीन नहीं करते। शायद आप फिर से उस घर जाने की सोचें… पर आपकी भलाई इसी में है कि वहाँ दोबारा कदम मत रखिएगा। आपका परिवार है, अपनी जान जोखिम में मत डालिए।”उनकी बात सुनकर मैं मन ही मन मुस्कुराया और सोचा—’इतनी मिन्नतों के बाद तो एक नौकरी मिली है, क्या इस भूत-प्रेत के डर से उसे भी छोड़ दूँ?’
