आखिरी प्लेटफार्म – भावेश पटेल
कहा जाता है कि हर रेलवे स्टेशन पर एक ऐसा प्लेटफॉर्म होता है,जो नक़्शे में नहीं दिखता…जो सिर्फ़ उसी इंसान […]
कहा जाता है कि हर रेलवे स्टेशन पर एक ऐसा प्लेटफॉर्म होता है,जो नक़्शे में नहीं दिखता…जो सिर्फ़ उसी इंसान […]
https://drive.google.com/file/d/10lPsE604xfGKiR8cmUdOK36oqSZFIQrf/view?usp=drivesdk
तीन दिन से लगातार बारिश हो रही थी।गाड़ी के टायर गीली सड़क पर फिसलते हुए आगे बढ़ रहे थे और
तीसरी मंजिल का पहरेदार (The Guardian of the 3rd Floor) रोहित को पैसों की सख्त जरूरत थी, इसलिए उसने शहर
https://drive.google.com/file/d/10lPsE604xfGKiR8cmUdOK36oqSZFIQrf/view?usp=drivesdk
यह कहानी ओडिशा के एक छोटे से गाँव देउलबाद की है। यह गाँव शहर से थोड़ा दूर था। गाँव में
कविता: “रात की चीख़” लेखक: अंकित शर्मा रात ढली, गांव की गलियाँ सुनसान, हवा में घुली थी डर की बेज़बान
तेरी शैडो भी मुझ पर न पड़े रात ने जब साँसें रोक लीं,दीवारों ने फुसफुसाना शुरू किया,तू बोली थी —
सन्नाटा 111 मुंबई के पुराने औद्योगिक इलाके में एक पुराना अपार्टमेंट ब्लॉक था, जिसे लोग “111” कहते थे। इसका नंबर