वापसी उस हवेली की —लक्ष्मी जायसवाल
सुनसान रातें थीं, चाँद था काफ़ी दूर,और हवाओं में कोई पुरानी सिसकी सी घुली थी।मैं लौटी थी उस हवेली में,जहाँ […]
सुनसान रातें थीं, चाँद था काफ़ी दूर,और हवाओं में कोई पुरानी सिसकी सी घुली थी।मैं लौटी थी उस हवेली में,जहाँ […]
यह कहानी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव की है, जहाँ एक पुरानी हवेली वर्षों से वीरान पड़ी थी।
साल 1994 में दिल्ली के मेहरौली इलाके में एक पुराने और उजड़े से बंगले के पास कुछ मजदूर काम कर
हर रात 12:30 बजे, उस सुनसान स्टेशन पर एक पुरानी ट्रेन की सीटी सुनाई देती थी। पर हैरानी की बात
यह कहानी रमेश यादव नाम के व्यक्ति की है, जो रेलवे में गार्ड की नौकरी करते थे। उन्हें अक्सर रात
मुंबई के उपनगर में एक पुरानी इमारत है – ‘शिव सदन’। एक संकरी, अंधेरी गली में छिपी हुई यह बिल्डिंग
राजस्थान की भूमि जहां एक ओर वीरों के साहस की गाथाएँ बिखरी हैं, वहीं दूसरी ओर वहां की रेत में
यह बारिश नहीं मेरी जान है,जिस पे लाखों लोग कुर्बान है,बूंदे जब गिरती है धरती पर यू लगता हैं जैसे
आधी रात की ठंडी सांसें,गूँज रही हैं खाली प्यासें।दीवारों से आती आहट,जैसे कोई कहे कोई बात अनजानी सी राहत। दरवाज़ा
मीनाक्षी को पुराने सामान इकट्ठा करने का शौक था। एक दिन उसे एक एंटीक दुकान से बहुत सुंदर आइना मिला।