रहस्यमयी बेटी – निलेश झारिया

रहस्यमयी बेटी

पुनीत छत्तीसगढ़ के बिलासपुर शहर में अपने छोटे से परिवार के साथ रहता था। परिवार में उसकी पत्नी सरिता और उनकी इकलौती बेटी सुप्रिया ही थे। पुनीत का घर पैसों की तंगी से जूझ रहा था, जिसकी वजह से आए दिन घर में कहा-सुनी होती रहती थी।एक दिन सरिता घर में बोर हो रही थी। उसने अपनी बेटी से कहा, “बेटी सुप्रिया, चल कहीं घूमकर आते हैं।”सुप्रिया ने मासूमियत से पूछा, “कहां मम्मी?”सरिता बोली, “कहीं रोड ट्रिप पर चलते हैं! तुम्हारे पापा तो हमें कभी घुमाने से रहे।”पास ही बैठा पुनीत चिढ़कर बोला, “सरिता, जानती तो हो कि पहले से ही पैसों की कितनी तंगी चल रही है। अगले महीने जब सैलरी आएगी, तब घूमने-फिरने का सोचेंगे।”

सरिता का गुस्सा फूट पड़ा, “तुम्हारा हर महीने का यही नाटक है! अगले महीने के बहाने बात टाल देते हो। घुमाना तो दूर की बात है, तुम हम दोनों के लिए कपड़े तक नहीं लाते। न जाने किस औरत पर इतना खर्चा करते हो?”यह सुनते ही पुनीत गुस्से से लाल-पीला हो गया और चिल्लाया, “ठीक है! घूमने जाना है न? चलो, कल ही चलते हैं!”

सुप्रिया डरते हुए बोली, “मुझे नहीं जाना पापा…”पुनीत ने लहजा थोड़ा धीमा किया, “सुप्रिया बेटी, मैं गुस्से में नहीं कह रहा। कल ही चलेंगे, ठीक है?”अगली सुबह तीनों सामान पैक करके मैनपाट के लिए निकल गए। मैनपाट जितना खूबसूरत है, उतने ही गहरे रहस्य और खतरनाक मोड़ अपने अंदर समेटे हुए है। पुनीत, सरिता और सुप्रिया को ज़रा भी भनक नहीं थी कि अगले मोड़ पर उनकी जिंदगी पूरी तरह बदलने वाली है।मैनपाट अभी काफी दूर था। ठिठुरती ठंड और घने कोहरे के कारण पुनीत सामने से आ रहे एक तेज़ रफ़्तार ट्रक को नहीं देख पाया। एक ज़ोरदार धमाके के साथ कार की ट्रक से टक्कर हो गई। कार लहराती हुई पहाड़ी घाटी के एक किनारे पर जाकर अटक गई।किस्मत से तीनों सही-सलामत बाहर निकल आए। उन्होंने बस पकड़ी, घर लौटे और मरहम-पट्टी करवाई। लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात यह थी कि सुप्रिया को एक खरोंच तक नहीं आई थी।उस एक्सीडेंट के बाद सुप्रिया का व्यवहार पूरी तरह बदल गया। वह अपने कमरे में अकेली बैठी हंसती रहती, लेकिन जैसे ही माता-पिता पास आते, बिल्कुल चुप हो जाती।एक रात सुप्रिया अपने पापा के कमरे में गई और अजीब तरह से रोने लगी। उसने पुनीत से कहा, “पापा… आपने मुझे क्यों नहीं बचाया?”पुनीत हड़बड़ाकर उठा, “क्या हुआ सुप्रिया?”सुप्रिया अचानक शांत होकर बोली, “कुछ नहीं पापा, मैं चलती हूं… नींद आ रही है।”अगली रात सुप्रिया फिर पुनीत के कमरे में दाखिल हुई। इस बार वह खामोशी से पुनीत के बेड के पास गई और अचानक उसका गला घोंटने लगी! पुनीत का दम घुटने ही वाला था कि तभी पीछे से सरिता की आहट हुई। सुप्रिया ने तुरंत गला छोड़ दिया और बिना कुछ कहे अपने कमरे में चली गई।अगले दिन सुबह रसोई में मटन पक रहा था। मटन की खुशबू सूंघते हुए सुप्रिया किचन में आई। उसके चेहरे पर एक खौफनाक मुस्कान थी।”मम्मी, आज मटन बना रही हो?”सरिता मुस्कुराई, “हां सुप्रिया, तुझे बहुत पसंद है न, वही बना रही हूं।”सुप्रिया की आंखें ठंडी पड़ गईं, “तो ठीक है, आप लोग अपने लिए और मंगवा लो…”इतना कहते ही सुप्रिया ने बर्तन में रखा कच्चा मटन उठाया और बिना पकाए ही उसे खूंखार तरीके से खाने लगी! यह खौफनाक मंज़र देखकर सरिता की रूह कांप गई। उसने डर और गुस्से में सुप्रिया को थप्पड़ मारना चाहा, लेकिन सरिता का हाथ सुप्रिया के शरीर के आर-पार निकल गया!सरिता चीख पड़ी, “कौन हो तुम?! मेरी बेटी सुप्रिया कहां है?”यह सुनते ही सुप्रिया ज़ोर-ज़ोर से रोने लगी। उसकी आवाज़ में इंसानी दर्द नहीं, बल्कि एक भटकती आत्मा की तड़प थी।”मम्मी… पापा किसी दूसरी औरत से प्यार करते हैं। मैंने उन्हें फोन पर कहते सुना था कि कल दोनों का काम तमाम कर दूंगा! मुझे तब समझ नहीं आया, लेकिन अगले ही दिन वे हमें मैनपाट ले गए। रास्ते में उनका फिर फोन आया… उन्होंने ट्रक वाले को बोल दिया था कि आज काम हो जाना चाहिए।”सरिता की आंखों से आंसू बहने लगे।सुप्रिया ने आगे बताया, “उस एक्सीडेंट में आप दोनों तो बच गए मम्मी… लेकिन मेरी मौत उसी घाटी में हो गई थी! आपके प्यार की वजह से मेरी आत्मा उस घाटी से यहां तक खिंची चली आई। मैं आपके साथ एक आम इंसान बनकर रह रही थी… लेकिन आप सुरक्षित नहीं हैं। पापा आज रात इस घर में आग लगाने वाले हैं, ताकि आपको मारकर अपनी दूसरी पत्नी और बच्चों के साथ भाग सकें!”हुआ भी यही। आधी रात को पुनीत ने चुपके से घर में आग लगा दी। लेकिन सुप्रिया की आत्मा ने सरिता को जगाकर उसकी जान बचा ली। सरिता उस जलते घर से निकलकर पुनीत की जिंदगी से बहुत दूर चली गई।कुछ दिनों बाद, पुनीत अपनी दूसरी पत्नी के साथ आराम से सो रहा था। अचानक कमरे का तापमान जमने लगा। सुप्रिया की खौफनाक आत्मा वहां प्रकट हुई। उसने पुनीत का गला इतनी सख्ती से दबाया कि उसकी मौके पर ही मौत हो गई।पुनीत के अंत के साथ ही सुप्रिया और उसकी मां को इंसाफ मिल गया था। सुप्रिया की आत्मा शांत होकर आसमान का एक चमकता तारा बन गई।कहानी का मोड़…कई महीनों बाद, सरिता एक नए शहर के छोटे से कमरे में सो रही थी। रात के गहरे अंधेरे में उसे खिड़की के पास से किसी के रोने की डरावनी आवाज़ सुनाई दी।सरिता ने डरते-डरते खिड़की से बाहर झांका, लेकिन वहां कोई नहीं था। उसने सोचा शायद हवा का वहम होगा और वापस सोने चली गई।तभी… खिड़की के कांच पर ‘टप-टप’ की आवाज़ हुई।सरिता ने जैसे ही मुड़कर देखा, खिड़की पर पुनीत की दूसरी पत्नी का अधजला हुआ भयानक चेहरा चिपका हुआ था! पलक झपकते ही वह जलती हुई चीखती आत्मा खिड़की को पार करती हुई सरिता के बेड के ठीक सामने आकर खड़ी हो गई!क्या सरिता इस भयानक आत्मा से बच पाएगी? क्या सुप्रिया की आत्मा एक बार फिर अपनी मां की रक्षा के लिए वापस आएगी?(जानिए कहानी के अगले भाग में…)

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