भूला जंगल का इंतज़ार- निलेश झारिया

भूला जंगल का इंतज़ार

एक अँधेरी रात में कृष्ण जंगल से गुजर रहा था। चारों ओर घना सन्नाटा था, केवल उसके पैरों तले सूखे पत्तों के चटकने की आवाज़ आ रही थी। उसके हाथ में एक कमजोर टॉर्च थी, जिसकी रोशनी बार-बार झपक रही थी।उस जंगल को गाँव वाले “भूला जंगल” कहते थे। मान्यता थी कि जो एक बार उसमें जाता है, वह रास्ता भूल जाता है।तभी उसके पीछे से किसी ने उसका नाम पुकारा।”कृष्ण… रुक जा…”कृष्ण ने पीछे मुड़कर देखा। वहाँ कोई नहीं था। केवल पेड़ और अंधकार था। उसने इसे अपना वहम समझा और तेज़ चलने लगा।फिर से वही आवाज़, इस बार बिल्कुल उसके कान के पास से आई।”कृष्ण… तू मुझे यहीं छोड़ कर चला गया था न?”कृष्ण का रक्त जम गया। यह आवाज़ जानी-पहचानी थी। दो वर्ष पूर्व इसी जंगल में उसकी मित्र निशा खो गई थी, जो आज तक नहीं मिली थी।अचानक टॉर्च बुझ गई। अंधेरे में उसे सामने एक पेड़ के नीचे सफ़ेद फ्रॉक में कोई बैठा हुआ दिखाई दिया।कृष्ण ने काँपते हुए पूछा, “कौन है?”उत्तर आया, “मैं निशा… तूने ही कहा था न, यहीं इंतज़ार करने को।””मुझे क्षमा कर दे निशा,” कृष्ण रो पड़ा।निशा हँसने लगी। एक अजीब, ठंडी हँसी।”क्षमा? मैं तो उसी रात मर चुकी थी कृष्ण। तेरे जाने के बाद यहाँ एक भेड़िया आया था…”इतना कहकर उसने अपना चेहरा ऊपर किया। उसका आधा चेहरा था ही नहीं।कृष्ण चिल्लाता हुआ पीछे भागा। पर जंगल समाप्त ही नहीं हो रहा था। हर पेड़ एक जैसा लग रहा था, जैसे वह गोल-गोल घूम रहा हो।तभी उसे सामने एक पुराना कुआँ दिखाई दिया।कृष्ण ने कुएँ में झाँका। उसमें पानी नहीं था। उसमें निशा नहीं थी। उसमें वह स्वयं पड़ा हुआ था, रक्त से लथपथ, और ऊपर से निशा उसे देखकर हँस रही थी।पीछे से निशा की आवाज़ आई, “अब तेरी बारी है यहाँ इंतज़ार करने की।”

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