रात के ठीक 2:30 बजे थे। बिहार के एक छोटे से गाँव की सुनसान, कच्ची सड़क पर लक्ष्मी की 🛵 अचानक बंद हो गई। उसने किक मारने की कोशिश की, लेकिन इंजन से कोई आवाज नहीं आई। तभी गाँव की एकमात्र स्ट्रीटलाइट भी टिमटिमाकर बुझ गई। पूरी सड़क पर घाना अंधेरा छा गया और अचानक हवा में जलती हुई चिता की गंध घुल गई।….
सड़क के बाईं ओर एक पुराना, सूखा हुआ बरगद का पेड़ था। लोककथाओं के अनुसार, उस पेड़ पर “चुड़ैल” का साया था। अचानक, पेड़ की सबसे ऊपरी डाली से एक औरत उल्टी लटकती हुई नीचे उतरी। उसके पैर पीछे की तरफ मुड़े हुए थे और उसके लंबे, उलझे बाल जमीन को छू रहे थे।
लक्ष्मी डर के मारे कांपने लगी। उसने भागने की कोशिश की, लेकिन उसके पैर जैसे जमीन से चिपक गए। वह आकृति पलक झपकते ही लक्ष्मी के ठीक सामने आ खड़ी हुई। उसकी आँखें एकदम गहरी और काली थीं, जो सीधे लक्ष्मी की आँखों में झाँक रही थीं। उसने अपनी लंबी, ठंडी उंगलियों से हवा में एक इशारा किया और भयानक आवाज़ में हंसी। उसकी आवाज़ पूरी घाटी में गूँज उठी, “इतनी रात को यहाँ अकेली…?”
अगली सुबह, ग्रामीणों को लक्ष्मी की 🛵 उसी बरगद के पेड़ के नीचे खड़ी मिली। लक्ष्मी का कहीं कोई पता नहीं था, बस पेड़ के तने पर उसका नाम गहराई से खुदा हुआ था……
