काली परछाई -अर्पिता शाहरे

काली परछाई

एक गांव में नीलकंठ नामक मुखिया था। उसकी एक बेटी थी। जिसका नाम गोरी था। गोरी बहुत ही सुंदर थी। उसे भेड़ोंसे बहुत ही ज्यादा लगाव था। उनके घर में बकरिया थे। उनकी बकरिया चराने के लिए गगन नाम का चरवाया था । गगन और गोरी एकदूसरे से प्यार करते थे। वे अक्सर सुनसान जगह मिला करते थे। एक दिन गांव के एक आदमी उन्हें देख लिया। और नीलकंठ को बता दिया। नीलकंठ ये सुनकर बहुत ही गुस्सा आया। गौरी के घर आते ही नीलकंठ ने गोरी को कोई गुस्सा नहीं किया। बस उससे । कहा की उसे देखने पास के गांव के जमींदार का बेटा आने वाला हे। ये सुनकर गोरी उदास हो गई। शाम को गगन बकरिया लेकर आया तो गोरी ने सारी बात गगन से कह दी। और गगन से पूछा _ क्या हम भाग जाए।गगन ने मना कर दिया। और कहा की में तुम्हारे पिता से तुम्हारा हाथ मांगूगा। उसी वक्त वे दोनों नीलकंठ के पास गए। और गोरी ने कहा __ बाबूजी हमें आपसे बात करनी हे। नीलकंठ जानता था, की वे क्या बात करना चाहते हैं।फिर भी नीलकंठ ने कहा_ ह बोलो। गगन डरते डरते बोला __ अ म मा मालिक , में ओर गोरी एकदूसरे से प्यार करते हैं। और हम शादी करना चाहते हैंइसपर नीलकंठ ने कहा । ठीक है इतना कहा। तभी गोरी ने नीलकंठ को गले से लगा लिया। फिर गगन अपने घर गया। तभी नीलकंठ ने कहा गोरी जाओ तिजोरी में से 2000 रूपये लेकर आओ। गौरी ने पैसे लाए। नीलकंठ ने कहा _ इस महीने काम के काम के पैसे गगन को देकर आता हु। इसी बहाने में गगन के पिता से भी बात कर लूंगा। अब तो गगन मेरा दामाद होने वाला हे। गौरी शर्मा गई।नीलकंठ गगन के घर की ओर बढ़ने लगा। उसने अपने साथ चार आदमी को ले लिया। गगन के घर के पास आकार वे रुक गए। गगन अपने पिता को गौरी से शादी की बात बता रहा था । पर गगन के पिता के चेहरे पर कोई खुशी नहीं दिखाई दे रही थी। गगन के पिता ने गगन से कहा _ नीलकंठ जैसा दिखता है वैसा नहीं है। तभी दरवाजा खटखत करने की आवाज आई । गगन ने दरवाजा खोला। नीलकंठ ने जोरदार लात गगन को मारी। गगन नीचे जा गिरा। मेरी बेटी से शादी करने की तेरी औकात है क्या। इतना कहकर नीलकंठ के आदमियों ने गगन और उसके पिता को पकड़ा। और खुप मारा। नीलकंठ ने गुंडोंको अपने गले का पुस्तैनी सोने का हार दिया। और कहा इन्हें जंगल लेकर जाओ। और अच्छी तरह खबर लो। फिर गुंडों ने गगन को और उसके पिता को लेकर गए।नीलकंठ ने घर जाने से पहले अपने आप को चोट पहुंचाई। और घर गया। गौरी अपने पिता का इंतजार कर रही थी। तभी नीलकंठ लगड़ाते हुए आया। उसे बहुत चोट लगी थी।और खून निकल रहा था। गौरी के पूछने पर नीलकंठ ने कहा कि उसका ये हाल गगन ने किया हे । वे तुमसे कोई प्यार नहीं करता। बस अपनी जायदाद हड़पने के लिए वो तुमसे प्यार का नाटक कर रहा था। मैने उसे अपने पिता से ये बात कहते सुना । तो मैने उसे टोका तो उल्टा उसने ही मुझे मारा और मेरे गले का अपना पुस्तैनी हार छीन कर अपने पिता के साथ भाग गया।बेटी अब मेरा बचना मुश्किल है। तू जल्दी से शादी कर ले। अगले दिन जमींदार के घर, राकेश से गौरी का रिश्ता जुड़ गया। और दो दिन के बाद उनकी शादी थी। इधर गगन और उसके पिता को गुंडे ने बांध कर रखा था। तभी एक आदमी बंदूक लेकर आया ।और गगन के पिता को मार डाला।और चला गया। दूसरे दिन गौरी की शादी थी।गुंडे उसके बारे में बात कर रहे थे। शादी के बाद वे गगन को मार डालेंगे। गगन ने वहां से भाग ने की सोची। दूसरी सुबह गुंडे सो रहें थे। उसका फायदा लेकर गगन ने रस्सी खोली।और पूरी जान लगाकर वैसे भगा।तभी गुंडे भी उसके पीछे भागे। किसी तरह से गगन गौरी के घर तक पहुंचा।पर तब तक की बिदाई हो चुकी थी।तब तक गुंडे भी वह पहुंच गए थे। उन्होंने गगन को खूब मारा । फिर नीलकंठ वहां आया। उसके कहने पर गगन को उन्होंने छोड़ दिया। गगन वहीं पर बेहोश होकर पड़ा रहा। जब उसे होश आया तब वो जैसे तैसे अपने घर आया। गगन कुछ देर तक रोया। पर अब वो हंसने लगा। और कहा _ नीलकंठ तुझे बर्बाद नहीं किया तो मेरा नाम भी गगन नहीं।उसने अपने दादाजी की तंत्र मंत्र की किताब खोली। वो किताब के पान पलटने लगा तभी उसके हाथ एक कागज लगा । जिसपर लिखा था काली परछाई साधना। काली परछाई साधना। ये वही साधना थी जिसे करने के बाद उस व्यक्ति की आत्मा काली परछाई में चली जाती है। और इतनी ताकतवर की चंद सेकंड में किसी भी व्यक्ति को मार डालने के लिए काफी हो। गगन ने खुद को घर में बंद कर लिया और पांच दिन तक काली परछाई साधना करने बैठ गया। उसने एक हवन कुण्ड जलाया । सिंदूर का घेरा बना कर वह बैठ गया। पांचवे दिन कुण्ड से धुएं से आकृति। निकली उसने गगन से कहा तुमने मुझे बुलाया। इसके बदले तुम्हे बहुत बड़ी कुर्बानी देनी पड़ेगी। गगन ने कहा में तैयार हु। इतना कहकर गगन ने कुण्ड के पास का चाकू उठाया और गला काट दिया। फिर उसकी आत्मा उस काले धूए में समा गई । अगली सुबह गगन की लाश गांव के चौरहे पर मिली। गांव के लोग लाश के पास जाने से डर रहे थे। सरपंच आया । उसे गगन को मरा हुआ देखकर खुशी हुई। नीलकंठ ने कहा इस चरवाहे ने खुदखुशी की हे। इसे जला दो। पर गगन को अग्नि देने के लिए कोई भी आगे नहीं आ रहा था। फिर नीलकंठ ने अपने आदमियों के साथ गगन को जला दिया ।

उसकी जलती हुई चिता को देखकर नीलकंठ मुस्कुरा रहा था। पर तभी उसे ऐसा लगा कि उसके पीछे से कोई घुर रहा है। नीलकंठ ने पीछे देखा। उसे पेड़ पर कुछ दिखा। वो पेड़ के पास गया। पेड़ को देखकर वो डर गया। क्योंकि पेड़ पर काली गुड़िया, काले धागे थे। वो जल्दी पलटा और घर की तरफ चला गया।उस पेड़ के पीछे से काली परछाई मुस्कुरा रही थी। रात को नीलकंठ आराम खुर्ची पर बैठा था। तभी उसके बगल में परछाई दिखी। नीलकंठ ने पीछे देखा।तो कोई नहीं था। वो थोड़ा डर गया।उसे दीवार से किसी के रेंगने की आवाज आने लगी। नीलकंठ ने दीवार की तरफ देखा। दीवार से बहुत ही डरावनी परछाई नीचे आ रही थी। ये देखकर नीलकंठ की रूह चीख गई।पर उसके गले से कोई आवाज नहीं निकल रही थी।वो परछाई झट से नीलकंठ के उपर झपटी। तभी नीलकंठ जोर से चीख कर खुर्ची से उठा । उसका पूरा बदन पसीने से भीग गया था। नीलकंठ खुर्ची से उठा उसे लगा बुरा सपना हे। फिर चेहरे पर पानी छिड़कर सोने की कोशिश कर रहा था। पर डर की वजह से सो नहीं पाया। अगले दिन गगन की काली परछाई गौरी के घर जा पहुंची वहां एक आदमी खुर्ची पर बैठा हुआ था। उसे देखकर गगन आग बबूला हो गया। क्योंकि ये वही आदमी था जिसने गगन के पिता को मरा था। तभी झाड़ू लगाते हुए उसे गौरी दिखी। गौरी बहुत उदास दिख रही थी। झाड़ू लगाते हुए टेबल पर रखा हुआ कांच का ग्लास गिरकर टूट गया। तभी राकेश उठा और गौरी को मारने लगा। फिर वह से चला गया। गौरी आईने के सामने रो रही थी। तभी आईने में काली परछाई दीखी। गौरी घबरा गई। पर वो वहा से हिल नहीं सकती थी, उसकी आवाज भी गले से निकल नहीं पा रही थी। तभी परछाई अपने असली रूप में आने लगी।अब आईने में गगन का रूप साफ दिख रहा था।अब गौरी की आवाज वापस आ गई।

गौरी ने कहा_ गगन तुम। हा में तुम्हारा गगन। गौरी ने कहा _ क्यों आए हो यहां।तुम तो भाग गए थे ना । गौरी में कहीं नहीं भगा था। तुम्हारे पिता ने ही तुम्हारे शादी तक मुझे और मेरे पिता को जंगल के बीच बांध कर रखा था। गगन ने गौरी को सब कुछ बता दिया। फिर गोरी ने कहा _ मुझे माफ कर दो । मैने मेरे पिता की बातों को सच मान लिया था। गगन मे तुमसे सचा प्यार करती हु ।मुझे अपने जैसा बना लो। फिर गौरी छत से कूद गई। फिर उसकी आत्मा काली परछाई में समा गई। राकेश ने कोई शोक नहीं मनाया। वो दारू पीकर बड़बड़ाने लगा । की वो दूसरी रखैल लाऊंगा।फिर गगन राकेश के सामनेआ गया। गौरी ने उसे रोक पर गगन ने गौरी से कहा क्योंकि मेरे पिता को मारने वाला राकेश ही है। फिर गगन ने राकेश को मार डाला। फिर वह नीलकंठ के घर आए।

यहां नीलकंठ गौरी को याद करके रो रहा था। तभी खिड़की से काला धुआं घर के अंदर आया। नीलकंठ सिसक के रो रहा था। तभी पीछे से आवाज आई। __बाबूजी नीलकंठ ने पीछे देखा। वह कोई नहीं था। अचानक सामने गौरी और गगन बहुत भयानक रूप में उसके सामने खड़े हुए। नीलकंठ डर गया। गौरी ने कहा बाबूजी आपने झूठ कहकर मेरी शादी राकेश से करवा दी। गगन बोला_तू मेरे ,मेरे पिता और गोरी का कातिल हे। क्यों तूने ऐसा किया बोल।नीलकंठ ने कहा_ में नहीं चाहता था की मेरी बेटी चरवाया के साथ शादी करे । मुझे माफ कर दो। मुझसे बहुत बड़ी गलती हुई है। गगन_ तूने गलती से नहीं जानबूझकर किया। मेरे बेकसूर पिता को बुरी तरह मारा। इतना कहकर गगन का काला धुआं नीलकंठ के अंदर चला गया।उसने नीलकंठ के शरीर को खोखला कर दिया ।अब नीलकंठ अपनी जगह से हिल तक नहीं रहा था।उसे बहुत ज्यादा दर्द हो रहा था। सरपंच जमीन पर पड़ा हुआ था। उसे उसी हालत में छोड़ कर उनकी रूह एकदूसरे का हाथ पकड़के आजाद हो गए।

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