आखिरी प्लेटफार्म – भावेश पटेल
https://drive.google.com/file/d/10lPsE604xfGKiR8cmUdOK36oqSZFIQrf/view?usp=drivesdk
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तीन दिन से लगातार बारिश हो रही थी।गाड़ी के टायर गीली सड़क पर फिसलते हुए आगे बढ़ रहे थे और
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तेरी शैडो भी मुझ पर न पड़े रात ने जब साँसें रोक लीं,दीवारों ने फुसफुसाना शुरू किया,तू बोली थी —
मैं न जीता हूँ, न मरता,फिर भी रात को सबको डराता।न शरीर है, न आवाज़,पर सन्नाटे में आता हूँ पास।आइने
“कुछ परछाइयाँ पीछा नहीं छोड़तीं… भले ही वो आपकी न हों।” गांव के एक कोने में एक पुरानी हवेली खड़ी