कुलधरा का खौफनाक सच
चार दोस्त—मोहन, रोशन, अंजलि और माही, सालों बाद मिलकर एक ऐसा एडवेंचर प्लान करते हैं जो उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी भूल बनने वाला था। माही की ज़िद पर वो चल पड़े राजस्थान के कुलधरा गांव… वो जगह, जिसे 200 साल पहले एक ब्राह्मण के खौफनाक श्राप के बाद रातों-रात खाली कर दिया गया था।

रास्ते में जब उन्होंने कार रोकी, तो सामने से आ रहे एक बूढ़े साधु ने चेतावनी दी:’बेटा, आगे मत बढ़ो… वो गांव इंसानों के लिए नहीं, भटकी हुई रूहों के लिए है!’लेकिन जवानी के जोश में चारों ने साधु की बात को मजाक समझा और आगे बढ़ गए।
रात ढल चुकी थी। सन्नाटे के बीच चारों ने गांव के वीरान खंडहरों के पास अपना कैंप लगा लिया।तभी… रात के ठीक 12:30 बजे चारों तरफ का तापमान अचानक बर्फ जैसा ठंडा हो गया। कैंप के बाहर से घुंघरुओं और रोने-चीखने की धीमी आवाजें आने लगीं।जब मोहन ने कैंप की ज़िप खोलकर बाहर देखा, तो चारों की रूह कांप गई!सामने कोई इंसान नहीं था… 200 साल पहले मरे हुए ग्रामीणों की एक सफेद, बेजान सायों वाली ‘अंतिम शव-यात्रा’ हवा में तैरती हुई निकल रही थी! उन सायों के चेहरे सड़े हुए थे और सबकी आंखें सीधे उनके कैंप की तरफ घूर रही थीं!डर के मारे चारों एक-दूसरे को पकड़कर सांस रोके बैठ गए। पूरी रात उन्होंने कांपते हुए भगवान का नाम लेकर काटी। जैसे ही सूरज की पहली किरण फूटी, वो गाड़ी में बैठकर बिना पीछे देखे वहां से भाग निकले!
