मैदान का हमशक्ल- घनश्याम

🎬 सीरीज़ का नाम: मैदान का हमशक्ल📖 कड़ी 1: मेरा मित्र वो नहीं था… (पूर्ण शुद्ध हिंदी)==================================

[ध्वनि प्रभाव : रात का गहरा सन्नाटा, दूर कहीं झींगुरों की आवाज़, और एक लड़के के भारी जूतों के दौड़ने की आवाज़—टप… टप… टप…]घनश्याम (सूत्रधार): “सेना की पोशाक पहनना मेरा सिर्फ सपना नहीं, मेरा जुनून था। और उस जुनून को पूरा करने के लिए मैं रोज़ सुबह ठीक 4:00 बजे उठ जाता था। जब पूरी दुनिया गहरी नींद में सो रही होती थी, तब मैं अपने घर का दरवाज़ा खोलकर उस घने, काले अंधेरे में कदम रखता था। मुझे नहीं पता था कि रोज़ की तरह शुरू होने वाली वो सुबह… मेरी ज़िंदगी की सबसे काली सुबह बनने वाली थी…”[ अचानक से तेज़ ठंडी हवा का झोंका और सन्नाटा और गहरा हो जाना]घनश्याम (सूत्रधार): “सुबह के ठीक 4:10 हो रहे थे। बाहर इतना कोहरा और अंधेरा था कि हाथ को हाथ नहीं सूझ रहा था। मैंने अपनी जेब से दूरभाष निकाला और सुनील का नंबर मिलाया। अमूमन वो एक घंटी में दूरभाष उठा लेता था, लेकिन उस दिन घंटी बजती रही। जब घंटी कटने ही वाली थी, तब अचानक संपर्क हुआ। पर दूसरी तरफ से कोई आवाज़ नहीं आई… सिर्फ एक अजीब सी, भारी साँस लेने की आवाज़ आ रही थी।”घनश्याम (बातचीत में): “हेलो? सुनील? भाई कहाँ है रे? मैं घर से निकल रहा हूँ, तू आ रहा है न?”

[दूरभाष की लाइन पर हल्की सरसराहट और गहरी, ठंडी साँस की आवाज़—हूँ… हूँ…]सुनील (दूरभाष पर – भारी आवाज़): “हाँ भाई… घनश्याम भाई… तू निकल… मैं… मैं चौराहे पर आ रहा हूँ…”[लोहे के भारी दरवाज़े के खुलने और बंद होने की चरमराती आवाज़—कूँ… चूँ…]घनश्याम (सूत्रधार): “उसकी आवाज़ सुनकर मुझे लगा कि शायद वो अभी-अभी सोकर उठा है। मैंने बिना ज़्यादा सोचे संपर्क काटा और अपने घर का मुख्य दरवाज़ा बंद किया। एक ठंडी सिहरन मेरी रीढ़ की हड्डी से होते हुए पूरे बदन में दौड़ गई। गाँव की वो गलियां आज न जाने क्यों पराई और डरावनी लग रही थीं। मुझे रत्ती भर भी अंदाज़ा नहीं था कि दूरभाष पर जो आवाज़ मैंने सुनी थी… वो सुनील की थी ही नहीं! वो कोई और था… जो मेरा चौराहे पर इंतज़ार कर रहा था।”[कोहरे के बीच से किसी के धीरे-धीरे चलकर आने की हल्की सरसराहट… लेकिन जूतों की साफ़ आवाज़ गायब है]

घनश्याम (सूत्रधार): “भागते-भागते मेरे कदम गाँव के उस पुराने और सुनसान चौराहे पर आकर रुक गए। कोहरे और घने अंधेरे को चीरते हुए सामने वाले रास्ते से एक काली आकृति मेरी तरफ बढ़ रही थी। जैसे ही वो आकृति चौराहे की मद्धम रोशनी के नीचे आई, मेरी जान में जान आई। हाँ, वो मेरा मित्र सुनील ही था। लेकिन उसे देखकर मेरे मन में एक अजीब सी बेचैनी ने जन्म लिया। रोज़ सुबह जब सुनील आता था, तो दूर से ही आवाज़ लगाता था… पर आज? वो बिल्कुल शांत था। कोहरे के बीच से वो किसी तैरती हुई परछाईं की तरह बिना कोई आवाज़ किए चुपचाप बढ़ा चला आ रहा था। उसकी आँखें नीचे झुकी हुई थीं…”

[ किसी दूर के कोने से एक कुत्ते के धीरे से रोने या दुबकने की हल्की आवाज़]

घनश्याम (सूत्रधार): “सुनील मेरे बिल्कुल सामने आकर खड़ा हो गया। एक ऐसी बेहद अजीब और खौफनाक बात हुई थी, जिस पर उस वक्त मेरा ध्यान नहीं गया। रोज़ जब सुनील अपने घर की गली से बाहर निकलता था, तो मोहल्ले के सारे आवारा कुत्ते उसे पहचानकर ज़ोर-ज़ोर से भौंकना शुरू कर देते थे। लेकिन आज एक भी कुत्ता नहीं भौंका। ऐसा लग रहा था कि वे किसी बहुत बड़े खतरे को भांपकर, डर के मारे कहीं गहरे अंधेरे में दुबक गए हैं।”घनश्याम (बातचीत में): “चल भाई, विलंब हो रहे हैं, आज दौड़ पूरी करनी है।”[

कोहरे में दो लोगों के कदमों की एक साथ चलने की आवाज़—टप… टप… टप…]घनश्याम (सूत्रधार): “रास्ते भर हम दोनों रोज़ की तरह ही बेहद सामान्य बातें कर रहे थे। वो अपनी सेना भर्ती की तैयारी, दौड़ के समय और गाँव की बातें बता रहा था। उसका वो बात करने का लहजा, उसकी वो जानी-पहचानी आवाज़… सब कुछ बिल्कुल हूबहू सुनील जैसा था। हम बातें करते रहे और तभी सामने दौड़ने वाले मैदान का वो जंग लगा लोहे का मुख्य द्वार आ गया।”[ लोहे के जंग लगे बड़े द्वार के खुलने की भारी चरमराती आवाज़—क्रैच…]घनश्याम (सूत्रधार): “चलते-चलते हमारे कदम मैदान के उस कोने पर आकर रुक गए, जहाँ हम रोज़ दौड़ने से पहले अभ्यास किया करते थे। मैदान पर प्रकाश नाम की कोई चीज़ नहीं थी। चारों तरफ सिर्फ एक स्याह, काला अंधेरा फैला हुआ था। आसमान की धुंधली सी चमक थी। मैदान के अंदर कदम रखते ही हवा का एक ऐसा बर्फीला झोंका आया कि मेरे बदन का खून जैसे जम सा गया। दौड़ने वाले मार्ग पर उतरने से पहले, हमेशा की तरह दौड़ शुरू करने से पहले मैं लघुशंका करने के लिए मैदान की उस पुरानी चारदीवारी की तरफ मुड़ गया। दीवार की तरफ मुंह करते ही, बस… बस कुछ ही क्षणों के लिए मेरी नज़र सुनील से हट गई।”

[अचानक दिल की धड़कन की तेज़ और भारी आवाज़—धक्… धक्… धक्…]घनश्याम (सूत्रधार): “दीवार की तरफ मुंह किए हुए मुझे अभी कुछ ही क्षण हुए थे कि अचानक वहाँ की हवा इतनी बर्फीली हो गई, मानो कड़कती ठंड आ गई हो। ठीक उसी पल, बिना किसी वजह के मेरा दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। एक अजीब सी घबराहट के साथ… मैं जैसे ही पीछे मुड़ा, मेरे पैरों तले ज़मीन खिसक गई! वहाँ कोई नहीं था… पूरा मैदान एकदम खाली पड़ा था!”घनश्याम (काँपती हुई आवाज़ में, फुसफुसाते हुए): “सुनील… ओ भाई सुनील… कहाँ है रे? देख, सुबह-सुबह ऐसी फालतू मज़ाक मत कर भाई… बाहर आ जा…”[मैदान में केवल घनश्याम की ही आवाज़ गूँजती है… और फिर अचानक जेब में रखे दूरभाष की लाउड और तीखी घंटी बजने लगती है—ट्रिंग… ट्रिंग…]घनश्याम (सूत्रधार): “उस रूह कंपा देने वाले सन्नाटे के बीच, मेरी जेब से आई उस तीखी आवाज़ ने मुझे चौंका दिया। मैंने काँपते हाथों से दूरभाष निकाला और उसकी मुख्य पटल देखी… वहाँ नाम चमक रहा था—’सुनील’। मेरे पूरे शरीर में एक भयानक सिहरन दौड़ गई। मैंने काँपते हाथों से कॉल स्वीकार की और दूरभाष कान से लगाया।”सुनील की माँ (दूरभाष पर – रोते हुए): “घनश्याम बेटा… सुनील को रात को बहुत तेज़ ज्वर आया है, वो चिकित्सक के पास चिकित्सालय में भर्ती है। सुबह अगर वो दौड़ने के लिए ना आए तो परेशान मत होना…”घनश्याम (सूत्रधार): “सुनील की माँ की वो बात सुनते ही मेरे दिमाग की नसें फटने लगीं। हाथ काँपने लगा और दूरभाष छूटकर सीधे ज़मीन पर जा गिरा। अगर असली सुनील चिकित्सालय के बिस्तर पर बेहोश पड़ा था… तो पिछले 20 मिनट से मेरे साथ कदम से कदम मिलाकर इस सुनसान मैदान तक कौन आया था? वो कौन था जिसने मुझसे सुनील की आवाज़ में बातें कीं? और तभी… मुझे मैदान के दूसरे कोने से किसी के चलने की आवाज़ आई।”

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