आधी रात की पिशाचिनी- रणदीप

मेरा नाम रणदीप है, और आज मैं आपको एक बहुत ही दिल दहला देने वाली कहानी सुनाने जा रहा हूं।जब मैं कॉलेज में था, तब हम चार दोस्त थे – मैं, नैना, राजा और रिंकू। हम सब शिमला की एक यूनिवर्सिटी में पढ़ते थे और हॉस्टल में रहते थे। धीरे-धीरे हमारी दोस्ती बहुत गहरी हो गई थी।

एक दिन हमें गर्मी की छुट्टियाँ मिलीं। हम सब मिलकर प्लान बनाने लगेंगे कि इस बार घर जाने की जगह कोई खूबसूरत जगह घूमेंगे। सबसे पहले नैना बोली, “गोवा चलते हैं। वहां के समुद्र तटों को देखकर बहुत मजा आएगा।”लेकिन मैं और राजा नास्तिक थे। हम भूत प्रेतों और भगवान में बिल्कुल विश्वास नहीं करते थे। सिर्फ रिंकू ही ऐसा था जो भगवान और पैरानॉर्मल चीज़ों में पूरा भरोसा रखता था। वो रोज़ पूजा करता था, और हमें उसकी बातों पर हंसी आती थी।उसकी बातों को गलत साबित करने के लिए मैंने एक जगह का नाम सुझाया – चांदी गांव।

ये मेरा पुराना गांव था, जम्मू कश्मीर की खूबसूरत वादियों में बसा हुआ। मेरे मां-बाप सालो पहले मुंबई शिफ्ट हो गए थे, और मैं पढ़ाई के लिए हिमाचल आ गया था।सबकी हाँ होते ही हम चाँदी गाँव के लिए निकल पड़े।रास्ते भर रिंकू थोड़ा डरा हुआ लग रहा था, जबकी मैं और राजा पूरी तरह बेफिकर थे। नैना भी थोड़ी घबरा रही थी, लेकिन हम उसे बार-बार समझा रहे थे कि ये सब सिर्फ अफ़वाह है।गांव पहुंचकर हमने एक होटल बुक किया और वहीं रुक गए। होटल के मालिक ने हमें सख्त चेतावनी दी कि सूरज ढलने के बाद उस पुराने जंगल वाले रोड पर बिल्कुल मत जाना।गांव वालों का कहना था कि उस सड़क पर एक खूबसूरत औरत रात को सफ़ेद कपड़ों में नज़र आती है। वो रोटी है, मदद मांगती है और लिफ्ट लेती है। जो भी उसे अपनी गाड़ी में बिठा लेता है, वो कभी जिंदा वापस नहीं आता।हमने बातों को मज़ाक समझा।उसकी रात लगभाग 11:30 बजे हम चारों चुपके से गाड़ी लेकर उस रोड पर निकल गये।रोड लगभाग ख़त्म होने ही वाला था कि अचानक हमारे सामने सुरक्षित लिबास पहन एक बेहद ख़ूबसूरत औरत आ गई।उसकी ख़ूबसूरती देखकर कुछ पल के लिए मेरा और राजा का होश उड़ गया। बारिश शुरू हो चुकी थी। उसका भीगा हुआ चेहरा और सफेद कपड़े किसी परी से कम नहीं दिखा रहे थे।उसने धीमी आवाज़ में कहा…”प्लीज़… मुझे लिफ्ट दे दीजिए…”उसकी आवाज सुनते ही रिंकू जोर से चिल्लाया…”रणदीप! गाड़ी मत रोकना! ये वही चुड़ैल है!”लेकिन हम उसकी बात मन्ने को तैयार ही नहीं थे।मैंने गाड़ी का शीशा नीचे कर दिया।जैसा ही शीशा खुला…वो औरत पल भर में अपना असली रूप लेकर सीधा राजा की गर्दन पर टूट पड़ी।उसके लंबे काले बाल, लाल आंखें और खून से भरे दांत देखकर हम सब की रूह कांप उठी।एक ही पल में उसने राजा की गर्दन फाड़ दी और उसका खून पीने लगी।हम सब इतने डर गए कि जैसे हमारे शरीर को लकवा मार गया हो।तभी राजा की दर्दनाक गाल ने मुझे होश में ला दिया।मैंने हिम्मत करके हमसे चुड़ैल को ज़ोर से लाट मारी।लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।राजा मार चूका था|

मैं गुस्से में गाड़ी से बाहर निकला और उसे ढूंढने लगा।तभी मेरे सामने सबसे खौफनाक मंज़र था…उसने नैना की गर्दन उखाड़ दी थी।और रिंकू को गले से पकड़कर हवा में उठाया गया था।मैं हमें तक नहीं जानता, उसने पहले ही रिंकू को भी मार दिया।मेरे तीनो दोस्त मेरी आँखों के सामने मर चुके थे।अब मुझे समझ आ गया था कि अगर मैं यहां एक सेकंड भी और रुक गया तो मेरी मौत भी तय है।मैं पूरी ताकत से उस सड़क से बाहर निकलने की तरफ दौड़ने लगा।मैंने सुना था कि वो चुड़ैल सिर्फ उसी रोड तक सिमित है।जैसे ही मेन रोड के आखिरी हिस्से के पास पहुंचने लगा…पीछे से उसकी खौफनाक आवाज आई…”रणदीप… रुक जाओ… तुम्हें भी अपने दोस्तों के पास भेजती हूं…”मैं बिना पीछे देखे भागता रहा।तभी उसने एक बड़ा पत्थर उठाकर मेरे सिर पर दे मारा।मैं ज़मीन पर गिर गया| मेरे सामने बस कुछ ही कदम दूर उस रोड का बोर्ड था, जिसके उस पार वो नहीं आ सकती थी।मैं पूरी ताक़त से घिसते हुए उस बोर्ड के उस पार पहुंच गया।वो हवा में उड़ती हुई मेरे बिल्कुल पास तक आ गई…लेकिन बोर्ड के उस पार आते ही वो रुक गई।उसकी लाल आंखें गुस्से से जल रही थी।मैं बच गया…लेकिन अपनी एक गलती की वजह से अपने तीन दोस्तों को हमेशा के लिए खो चुके थेक्या वो औरत आज भी उसी सड़क पर भटकती है?आख़िर उसकी असली कहानी क्या है?और वो उस रोड के बाहर क्यों नहीं आ सकती?सब सवालों का जवाब मिलेगा इस कहानी के पार्ट 2 में।

𝙿𝚊𝚛𝚝 2मैं उस बोर्ड के उस पार ज़मीन पर पड़ा तड़प रहा था। सर से खून बह रहा था और आने वाले हर दोस्त के साथ मेरी सांसें उखड़ रही थीं। मैंने देखा कि वो चुड़ैल हमसे आदर्श दीवार के पास खड़ी होकर गुस्से में कांप रही थी, पर एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पा रही थी। उसके चेहरे पर गुस्से से ज्यादा एक अजीब सा खौफ था—जैसे आगे बढ़ने पर वो खुद भस्म हो जाएगी।सुबह जब गांव के कुछ लोग हमें रास्ते से गुजरते हैं, तो उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया जाता है। कुछ दिनों बाद जब मैं चलने-फिरने लायक हुआ, तो मैं सीधा गांव के पुराने मंदिर के पुजारी जी के पास गया। अपने दोस्तों को खाने का गम और उस चुड़ैल का खौफ मुझे अंदर ही अंदर खाये जा रहा था। . मैंने पुजारी जी से पूछा, ये क्या रहस्य है उस रोड का उस औरत का कृपा करके मुझे बताएं वह कब से इस गांव में है पुजारी जी ने मेरी पूरी बात सुनी और एक गहरी सांस लेकर बोले, “रणदीप, जो तुमने देखा वो कोई आम भूत या चुड़ैल नहीं है। बलका एक पशाशनी है जो लोगों को मार के उनका खून भी जाती है और उनका दिल निकाल के खाती है वह तो पहले गांव में आकर भी लोगों का शिकार करती थी गांव वालों ने परेशान होकर मेरे दादाजी के पास आए और उन्हें यह सुरक्षा घेरा बना दिया गांव के साइड यूज रोड के बोर्ड के इस साइडपुजारी जी की बातें सुनकर मेरे दिमाग में एक अजीब सा जुनून सवार हो गया। उनको बताया कि वो कोई आम भूत नहीं, बल्कि एक बेहद बुरा और खून की प्यासी पिशाचिनी है। पहले तो वो सिर्फ उस रोड पर आने-जाने वाले मुसाफिरों को मारती थी, लेकिन अब उसकी भूख इतनी बढ़ गई थी कि उसने गांव वालों पर भी हमला करना शुरू कर दिया था। गांव वाले उसके खौफ से कांपते थे, और इसी वजह से मंदिर की इस पवित्र सीमा को बनाया गया था ताकि वो गांव के अंदर न घुस सके।लेकिन इस सच ने मेरे अंदर के डर को गुस्से में बदल दिया।मेरा सर फट रहा था, पर उससे ज़्यादा दर्द मेरे दिल में था। नैना की वो आखिरी चीख, राजा का वो तड़पता हुआ चेहरा, और रिंकू की वो बेबस आंखें- ये सब मुझे बार-बार दिखायी दे रहे थे। मुझे एहसास हुआ कि उन तीनो की मौत का असली गुनेहगर कोई और नहीं, बल्कि मेरा घमंड था। अगर मैं नास्तिक बनने का नाटक ना करता, अगर मैं उन्हें उस सड़क पर ना ले जाता, तो आज मेरे दोस्त जिंदा होते।”मैं उन्हें अकेला नहीं छोड़ सकता…” मैंने दबी आवाज में कहा।पुजारी जी ने मुझे रोकने की कोशिश की, “रणदीप! पागलमत बनो! वहां जाओगे तो जिंदा वापस नहीं आओगे!”लेकिन मुझ पर अब मौत का खौफ नहीं, बाल्की बदले और पश्चताप का भूत सवार था। मैंने सोचा- हां तो मैं उस पिशाचिनी को खत्म कर दूंगा, या फिर अपने दोस्तों के पास हमेशा के लिए चला जाऊंगा। इस ग्लानि (अपराध) के साथ जीने से बेहतर था मर जाना।मैंने मंदिर से एक पवित्र त्रिशूल उठाया, गांव वालों की चेतना को पीछे छोड़ा, और लौटते हुए दोबारा उसी रोड की तरफ निकल पड़ा।रात के 12 बज रहे थे. बारिश और तेज़ हो चुकी थी। जैसे ही मैं उस बोर्ड के पास पहुंचा, मैंने देखा कि वह पिशाचिनी वहां पहले से खादी मेरा इंतजार कर रही थी। उसके चेहरे पर एक डरंदगी भारी मुस्कान थी।मैंने एक गहरी सांस ली, मंदिर की सुरक्षित सीमा को पार किया, और गुस्से में चिल्लाते हुए उस रोड के अंदर घुस गया…जैसा ही मैंने मंदिर की सुरक्षित सीमा पार की… मेरे बगीचे के बिल्कुल पास किसी ने धीरे से फुसफुसाया…’रणदीप…इस बार तुम बचकर नहीं जा पाओगे…’मैं धीरे-धीरे पीछे मुड़ा…और जो मैंने देखा…उसने मेरी रूह तक हिला दी…क्या रणदीप अपने दोस्तों का बदला ले पाएगा?क्या मंदिर का वो त्रिशूल उस सादियों पुरानी पिशाचिनी को ख़त्म कर देगा?या फ़िर रणदीप भी अपने दोस्तों की तरह उस रोड का एक और शिकार बन जायेगा?और उस सड़क के अँधेरे में छुपा वो आखिरी रहस्य क्या है जो रणदीप के सामने आने वाला है?सब सवालों के खौफनाक जवाब मिलेंगे इस कहानी के अगले हिस्से में- भाग 3 (अंतिम तसलीम) में!जैसा ही मैंने मंदिर की सुरक्षित सीमा पार की, मेरे पीछे एक बर्फ जैसा ठंडी सांस महसूस हुई। किसी ने मेरे कान के पास फुसफुसाया, “रणदीप…इस बार तुम बचकर नहीं जा पाओगे…”खौफनाक रूप: मैं जैसा ही पीछे मुड़ा, पिशाचिनी हवा में तैर रही थी। उसकी लाल आँखें अँधेरे में चमक रही पतली और उसके लम्बे काले बाल चारो तरफ फेल हुए थे। उसने ज़ोर से ठहाका लगाया, जिसका पूरा जंगल कानप उठा।पिशाचिनी ने अपनी मायावी शक्ति से मेरे सामने राजा, नैना और रिंकू के धुंधले साए खड़े कर दिए। उन्हें देखकर मैं थोड़ा भटक गया और घबराहट में मेरा ध्यान भटक गया।अचानक याद आना: उसके भटकव के बीच, मेरे दिमाग में पुजारी जी की वो बात अचानक गूँजी जो उन्हें मंदिर में कहीं थी, जैसे मैं जुनून में भूल गया था: “रणदीप, उस पिशाचिनी पर कहीं और वार करने से कुछ नहीं होगा। उसकी जान सिर्फ उसकी दोनों आँखों के ठीक बीच (ललाट) पर है वही उसका सबसे बड़ा कामज़ूर निर्देश है।”पिशाचिनी का तीर की तरह झपटना: इससे पहले कि मैं त्रिशूल उठाकर निशाना लगाता, पिशाचिनी ने तेजी से मुझ पर हमला किया।

उसकी रडार जैसी उंगली और पंजे सीधा मेरी गर्दन पर आकार लगे।गर्दन पर गहरा ज़ख्म: उसने पूरी ताकत से मेरी गर्दन को जकड़ कर फाड़ दिया। असाहय दर्द से मेरी गाल निकल गई, और मेरे जिस्म से तेजी से खून बहने लगा। मेरी आँखों के सामने अँधेरा छाने लगा था, और मुझे अपनी मौत बिलकुल करीब नज़र आ रही थी।अपनी घिरते हुए सांसो और बची-खुची आखिरी ताकत को समेटकर, मैंने सोचा कि मैं अपने दोस्तों के पास खाली हाथ नहीं जाउंगा। मैंने पूरी जान लगाकर पवित्र त्रिशूल को सीधा उसकी दोनों आंखों के ठीक बीच में घुपसा दिया।पिशाचिनी का भस्म होना: त्रिशूल के लगते ही पिशाचिनी के मुंह से एक ऐसी दर्दनक गाल निकली जो शायद सदियों तक उस जंगल में गूंजेगी। उसके जिस्म से नीली आग निकलने लगी और देखते ही देखते वो राख के ढेर में बदल गई।रणदीप की आखिरी सांस: पिशाचिनी के ख़तम होते ही उस रोड का श्राप हमेशा के लिए टूट गया। इधर, मेरे सर और बगीचे से इतना खून बह चुका था कि मेरी सांसें थमाने लगीं। मैंने आसमां की तरफ देखा, जहां मुझे नए सवेरे की किरण दिखी और ऐसा लगा जैसे मेरे दोस्त मुझे मुस्कुरा कर बुला रहे हैं। मैं हमेशा के लिए उनके पास चला गया।

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