महल का रहस्य – हर्षित त्रिपाठी

अर्जुन और काव्या की शादी बड़े धूमधाम से संपन्न हुई। दोनों परिवारों में खुशी का माहौल था। अगले दिन काव्या की विदाई हुई और वह अपने नए घर आ गई। शाम को अर्जुन ने मुस्कुराते हुए काव्या को एक सरप्राइज़ दिया।”हम हनीमून पर जा रहे हैं,” अर्जुन ने कहा।”सच?” काव्या खुशी से उछल पड़ी।अर्जुन ने बताया कि उसने मनाली के पास जंगलों के बीच स्थित एक खूबसूरत फार्महाउस खरीदा है, जहाँ वे कुछ दिन अकेले और सुकून से बिताएँगे।दोनों अगले ही दिन यात्रा पर निकल पड़े।

लंबी यात्रा के बाद जब वे फार्महाउस पहुँचे, तो काव्या उसकी खूबसूरती देखकर मंत्रमुग्ध रह गई। चारों ओर घना जंगल था, दूर-दूर तक कोई आबादी नहीं थी। सन्नाटे के बीच वह विशाल फार्महाउस किसी सपने जैसा लग रहा था।”यह सब तुम्हारे लिए है,” अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा।काव्या की खुशी का ठिकाना नहीं रहा। दोनों ने पूरा दिन फार्महाउस घूमने और अपनी नई ज़िंदगी के सपने बुनने में बिताया।लेकिन उसी रात सब कुछ बदल गया।

आधी रात के समय अचानक काव्या की नींद खुल गई। उसे ऐसा लगा जैसे कोई ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा पीट रहा हो।ठक… ठक… ठक…आवाज़ लगातार गूँज रही थी।काव्या ने अर्जुन को जगाने की कोशिश की, लेकिन वह गहरी नींद में था। डरते-डरते वह बिस्तर से उठी और पूरे घर का निरीक्षण करने लगी।मुख्य दरवाज़ा बंद था।खिड़कियाँ भी अंदर से बंद थीं।फिर भी दरवाज़ा पीटने की आवाज़ बंद नहीं हो रही थी।कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ कि आवाज़ घर के तहखाने की दिशा से आ रही है।उसका दिल तेज़ी से धड़कने लगा।वह धीरे-धीरे सीढ़ियाँ उतरकर तहखाने के दरवाज़े तक पहुँची। जैसे ही वह दरवाज़े के पास पहुँची, आवाज़ अचानक बंद हो गई।पूरा वातावरण भयावह सन्नाटे में डूब गया।काँपते हाथों से काव्या ने तहखाने का दरवाज़ा खोल दिया।अंदर अँधेरा ही अँधेरा था।वहाँ कोई नहीं था।काव्या ने राहत की साँस ली और पीछे मुड़ने लगी।तभी उसे अपने ठीक सामने एक भयानक चेहरा दिखाई दिया।उसकी आँखें पूरी तरह सफेद थीं और चेहरा खून से सना हुआ था।काव्या की चीख निकल गई।लेकिन अगले ही पल वह चेहरा गायब हो गया।चीख सुनकर अर्जुन भागता हुआ वहाँ पहुँचा।”क्या हुआ?” उसने घबराकर पूछा।काव्या काँपती हुई पूरी घटना बताने लगी।अर्जुन ने उसे समझाया, “तुम थक गई हो। शायद यह तुम्हारा भ्रम था।”काव्या पूरी तरह आश्वस्त नहीं हुई, लेकिन वह चुपचाप वापस कमरे में चली गई।

अगली सुबह दोनों आसपास टहलने निकले।जंगल के रास्ते पर उन्हें एक बूढ़ा चौकीदार मिला।उसने दोनों को देखते ही कहा, “तुम लोगों ने उस फार्महाउस में रहकर ठीक नहीं किया।””क्यों?” अर्जुन ने पूछा।बूढ़ा कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “वहाँ रात को अजीब आवाज़ें आती हैं। कई लोगों ने वहाँ परछाइयाँ देखी हैं। उस जगह में कुछ ठीक नहीं है।”अर्जुन हँस पड़ा।”ये सब अंधविश्वास है,” उसने कहा।लेकिन काव्या के चेहरे पर डर साफ दिखाई दे रहा था।उसी दिन दोपहर को अर्जुन को किसी ज़रूरी काम से पास के शहर जाना पड़ा।अब फार्महाउस में काव्या अकेली थी।शाम ढलते ही अचानक रसोईघर से काँच टूटने की तेज़ आवाज़ आई।घबराकर काव्या रसोई की तरफ भागी।अंदर का दृश्य देखकर उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।एक आदमी बर्तन धोने वाले सिंक पर उकड़ूँ बैठा हुआ था।उसकी पीठ काव्या की तरफ थी।”क… कौन हो तुम?” काव्या ने काँपती आवाज़ में पूछा।धीरे-धीरे उस आदमी ने अपना सिर उसकी ओर घुमाया।उसकी आँखें पूरी तरह काली थीं।फिर उसकी गर्दन अस्वाभाविक तरीके से एक तरफ और फिर दूसरी तरफ मुड़ने लगी।काव्या की चीख निकल गई।वह भागती हुई अपने कमरे की ओर दौड़ी।लेकिन वह डरावना आदमी भी उसके पीछे आने लगा।काव्या कमरे में घुसी और तुरंत दरवाज़ा बंद कर लिया।काँपते हुए वह बिस्तर पर चढ़ गई और अर्जुन को फोन लगाने लगी।तभी अचानक किसी ने बिस्तर के नीचे से उसका पैर पकड़ लिया।काव्या चीख उठी।अगले ही पल उसे ज़ोर से नीचे खींच लिया गया।और फिर पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया…(जारी…)

जब अर्जुन फार्महाउस वापस लौटा तो उसने देखा कि काव्या बरामदे में बेहोश पड़ी हुई है। वह घबरा गया और तुरंत डॉक्टर को बुलाया।डॉक्टर ने जैसे ही काव्या की जाँच शुरू की, अचानक काव्या की आँखें बंद रहते हुए भी उसके मुँह से एक भारी और डरावनी आवाज़ निकली।”मेरा वर्षों पुराना बदला अधूरा है… उसे यहाँ आना होगा… मैं अपना बदला लेकर रहूँगा…”कमरे में मौजूद सभी लोग डर गए।

अगले ही पल काव्या ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगी।डॉक्टर ने अर्जुन को सलाह दी कि काव्या को किसी मनोवैज्ञानिक के पास ले जाया जाए।अगले दिन अर्जुन काव्या को एक प्रसिद्ध साइकोलॉजिस्ट के पास ले गया। डॉक्टर ने काव्या को सम्मोहित करके उसके बचपन और पुराने अनुभवों के बारे में पूछताछ की, लेकिन काव्या ने ऐसी किसी घटना का उल्लेख नहीं किया जो किसी मानसिक आघात की ओर इशारा करे।साइकोलॉजिस्ट ने अर्जुन से कहा,”मुझे नहीं लगता कि यह किसी मानसिक बीमारी का मामला है।”अर्जुन और भी परेशान हो गया।उस रात दोनों फिर फार्महाउस लौट आए।आधी रात को अर्जुन की नींद खुली तो उसने देखा कि काव्या बिस्तर पर नहीं है।वह पूरे घर में उसे ढूँढने लगा।आखिरकार उसे काव्या छत की रेलिंग पर खड़ी दिखाई दी।काव्या धीरे-धीरे उसकी तरफ मुड़ी।उसकी आँखें पूरी तरह बदल चुकी थीं।वह भारी आवाज़ में बोली,”यह तेरी काव्या नहीं है… मैं रघु हूँ…”इतना कहकर वह बेहोश होकर गिर पड़ी।अर्जुन उसे कमरे में लेकर आया।अगली सुबह वह उस बूढ़े चौकीदार के पास पहुँचा जिससे उसकी मुलाकात पहले हुई थी।चौकीदार ने सारी बात सुनने के बाद कहा,”इस जगह पर सालों से एक बेचैन आत्मा भटक रही है। अगर जल्द कुछ नहीं किया गया तो वह काव्या को पूरी तरह अपने वश में कर लेगी।”फिर चौकीदार अर्जुन को एक तांत्रिक बाबा के पास ले गया।अगले दिन तांत्रिक बाबा फार्महाउस पहुँचे।उन्होंने काव्या को एक कुर्सी पर बैठाया और मंत्रोच्चार शुरू किया।जैसे ही उन्होंने गंगाजल छिड़का, काव्या बुरी तरह तड़पने लगी।अचानक उसकी कुर्सी हवा में उठ गई।कमरे में मौजूद सभी लोग डर से काँप उठे।तांत्रिक बाबा गरजे,”कौन है तू?”काव्या के मुँह से भारी आवाज़ निकली,”मैं रघु हूँ…””तू इस लड़की को क्यों परेशान कर रहा है?”रघु बोला,”इसके पिता ने मेरी जान ली थी।”यह सुनकर अर्जुन चौंक गया।उसे लगा कि अब सच जानने का समय आ गया है।उसने तुरंत काव्या के माता-पिता को बुलाया।जब वे फार्महाउस पहुँचे तो तांत्रिक बाबा ने उनसे सच्चाई बताने को कहा।काव्या के पिता रो पड़े।उन्होंने बताया कि वर्षों पहले वे इसी फार्महाउस में रुके थे।उस समय रघु वहाँ का केयरटेकर था।

एक रात किसी बात को लेकर दोनों में झगड़ा हो गया।हाथापाई के दौरान रघु की मौत हो गई।डर के कारण उन्होंने उसका शव तहखाने में छिपा दिया और वहाँ से चले गए।तब से यह रहस्य दुनिया से छिपा हुआ था।अब सभी लोग तहखाने में पहुँचे।वहाँ मिट्टी खोदने पर रघु का कंकाल मिला।तांत्रिक बाबा ने कहा,”जब तक इसके अवशेषों का अंतिम संस्कार नहीं होगा, इसकी आत्मा को मुक्ति नहीं मिलेगी।”अर्जुन पेट्रोल और माचिस लेने गया।लेकिन तभी रघु की आत्मा प्रकट हो गई।कमरे में रखी चीज़ें उड़ने लगीं।सब लोग इधर-उधर गिरने लगे।रघु का क्रोध भयानक रूप ले चुका था।उसने अर्जुन पर हमला कर दिया।लोहे की एक भारी वस्तु अर्जुन के सिर से टकराई और वह ज़मीन पर गिर पड़ा।रघु अब काव्या के पिता की ओर बढ़ रहा था।उसी समय अर्जुन को होश आ गया।उसने पूरी ताकत जुटाकर माचिस जलाई और रघु के कंकाल पर आग लगा दी।जैसे ही आग भड़की, पूरे तहखाने में एक भयानक चीख गूँज उठी।कुछ ही क्षणों बाद सब शांत हो गया।रघु की आत्मा को आखिरकार मुक्ति मिल चुकी थी।काव्या पूरी तरह सामान्य हो गई।फार्महाउस पर छाया वर्षों पुराना श्राप समाप्त हो चुका था।अर्जुन और काव्या वहाँ से हमेशा के लिए चले गए।लेकिन जाते समय अर्जुन को ऐसा लगा जैसे दूर खड़ा कोई व्यक्ति मुस्कुराते हुए उन्हें विदा कर रहा हो।शायद रघु को आखिरकार न्याय मिल गया था।

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