पुनपुन घाट की आखिरी ट्रेन – चंदन

पुनपुन घाट की आखिरी ट्रेन:

रूह कंपा देने वाला अंतपुनपुन स्टेशन की रातें वैसे ही भारी होती हैं, लेकिन उस रात सन्नाटा इतना गहरा था कि राहुल को अपनी ही धड़कन किसी के कदमों की आहट जैसी लग रही थी। 2:15 बजे, बिना किसी अनाउंसमेंट के, एक ट्रेन प्लेटफार्म पर रेंगती हुई आई। उसकी बोगियों से ऐसी बदबू आ रही थी जैसे कोई चीज बरसों से सड़ रही हो।राहुल ने मजबूरी में डिब्बे के अंदर कदम रखा।

दूसरी दुनिया का खौफनाक मंजर जैसे ही ट्रेन ने चलना शुरू किया, उसकी रफ्तार सामान्य नहीं थी। खिड़कियों के बाहर का दृश्य धीरे-धीरे धुंधला होने लगा और पुनपुन नदी के पानी का रंग खून की तरह गहरा लाल हो गया। ट्रेन अचानक एक ऐसी सुरंग में दाखिल हुई जहाँ रोशनी नहीं थी, बल्कि दीवारों पर मानव मांस जैसी थरथराती हुई परतें थीं।ट्रेन एक ऐसे स्टेशन पर रुकी जहाँ का प्लेटफार्म इंसानी हड्डियों से बना था। वहां के निवासी—अगर उन्हें जीव कहा जा सके—वे अजीब तरह के विकृत प्राणी थे। उनके पास चेहरा नहीं था, बस चीरती हुई मुस्कुराहटें थीं जो कानों तक फैली थीं।एक डरावनी सच्चाईअखबार वाला आदमी, जो अब तक बैठा था, अचानक राहुल के ठीक सामने आ खड़ा हुआ। उसका चेहरा अब भी अखबार से ढका था, लेकिन उसके हाथों की उंगलियां हड्डियों की तरह लंबी और नुकीली थीं। उसने धीमी, डरावनी आवाज में कहा:”तुम यहाँ आने वाले पहले इंसान नहीं हो… यहाँ हर यात्री को एक कीमत चुकानी पड़ती है। तुम अपनी परछाईं दे दो, तो तुम्हें वापस भेज देंगे।”राहुल की रूह कांप उठी। उसने देखा कि ट्रेन के फर्श पर बहुत सारे लोगों की परछाइयां अंकित थीं, जो तड़प रही थीं। तभी, ट्रेन का दरवाजा खुद-ब-खुद बंद हो गया और अंदर का तापमान इतना गिर गया कि राहुल के बाल जमने लगे। उसके सामने बैठे प्राणी ने अखबार हटाया, तो वहां कोई चेहरा नहीं, बल्कि राहुल का अपना ही चेहरा था, जो रो रहा था और मदद मांग रहा था।

अंतिम चेतावनी राहुल ने अपनी आँखें बंद कर लीं और चिल्लाते हुए चलती ट्रेन के दरवाजे से बाहर छलांग लगा दी। उसे लगा जैसे उसे हज़ारों ठंडे, निर्जीव हाथों ने जकड़ लिया हो और उसे नीचे खींच रहे हों।अगले ही पल उसे एक जोर का धक्का लगा और वह पुनपुन स्टेशन की पटरियों के बीच गिरा हुआ था। सुबह हो चुकी थी, लेकिन स्टेशन एकदम वीरान था। जब उसने अपनी तरफ देखा, तो उसके पैरों के पास कोई परछाईं नहीं थी। सूरज की तेज धूप पड़ रही थी, लेकिन जमीन पर राहुल के शरीर का कोई साया नहीं था।उसकी जेब में वही रहस्यमयी पत्थर था, जो अब खून की तरह सुर्ख लाल रंग का हो चुका था और उससे किसी के फुसफुसाने की आवाज आ रही थी—”हम वापस आएंगे, अपनी परछाईं लेने।”राहुल ने काँपते हाथों से उस लाल पत्थर को बाहर निकाला। जैसे ही उसने उसे हथेली पर रखा, पत्थर के अंदर से किसी के चीखने की आवाज़ आने लगी। अचानक पत्थर की सतह पर एक चेहरा उभर आया। वह चेहरा उसी आदमी का था जिसने ट्रेन में अखबार पढ़ रखा था।वह मुस्कुराया और बोला, “तुम सोचते हो कि तुम बच गए हो?”पत्थर हवा में रुक गया। अगले ही पल स्टेशन पर मौजूद सभी परछाइयाँ अपनी जगह से अलग होने लगीं। पेड़ों की परछाइयाँ, खंभों की परछाइयाँ और स्टेशन की इमारत की परछाईं भी जमीन से उठकर रेंगने लगी।तभी स्टेशन के पुराने लाउडस्पीकर अपने आप चालू हो गए—”आखिरी ट्रेन प्लेटफार्म नंबर शून्य पर आ चुकी है… जिन यात्रियों की परछाईं बची है, कृपया तुरंत सवार हो जाएँ…”कोहरे के बीच वही सड़ी हुई ट्रेन फिर से खड़ी थी। खिड़कियों में सैकड़ों सफेद आँखें राहुल को घूर रही थीं। एक खिड़की में राहुल ने खुद को बैठे देखा। वह मुस्कुराया और शीशे पर लिखा—”अब तुम्हारी बारी है।”इसी बीच प्लेटफार्म के आखिरी छोर पर एक पुराना कुआँ दिखाई दिया। कुएँ के भीतर सैकड़ों तड़पती परछाइयाँ थीं। उनकी गर्दनें एक साथ राहुल की तरफ मुड़ीं और वे चीख उठीं—”हमें बाहर निकालो…”कुएँ से एक विशाल काला हाथ निकला और राहुल के पैर को पकड़ लिया। वह उसकी अपनी खोई हुई परछाईं थी।वह फुसफुसाई—”अब शरीर मेरा है… और तुम सिर्फ़ एक भटकती हुई आत्मा हो…”अगली सुबह लोगों को पटरियों के पास केवल वह लाल पत्थर मिला। राहुल कभी नहीं मिला।लेकिन आज भी रात 2:15 बजे, पुनपुन घाट के पास अगर कोई अकेला खड़ा हो, तो दूर से ट्रेन की सीटी सुनाई देती है। और अगर गलती से कोई उस दिशा में देख ले, तो ट्रेन की खिड़की में राहुल दिखाई देता है, जो शीशा पीटते हुए बस एक ही बात कहता है—”मत चढ़ना… वरना वापस नहीं आ पाओगे…”

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