Horror Story

छाया का कमरा – लक्ष्मी जायसवाल

छाया का कमरा

मुंबई से दूर महाराष्ट्र के एक पहाड़ी गाँव में एक वीरान बंगला था—’राजवाड़ी हवेली’। लोग कहते थे, वहाँ रात के समय छाया सी कोई चीज़ चलती है, दरवाज़े खुद-ब-खुद खुलते हैं, और दीवारों से कभी-कभी रोने की आवाज़ आती है। कोई उसके पास जाता नहीं था, सिवाय उस लड़की के—आरुषि।

आरुषि, एक 24 साल की युवा लेखक, अपनी अगली हॉरर बुक के लिए सच्ची घटनाओं पर रिसर्च कर रही थी। गाँव वालों ने मना किया, लेकिन उसने ज़िद पकड़ी कि वह उस हवेली में एक रात बिताकर ही मानेगी।

रात के 9 बजे आरुषि बैग लेकर हवेली पहुँची। भारी लकड़ी का दरवाज़ा खुद ही “चर्रर…” की आवाज़ के साथ खुल गया। अंदर धूल, मकड़ी के जाले और एक अजीब सी ठंडक थी। दीवारों पर पुराने चित्र थे—राजा-रानी, एक बच्चा, और एक अजीब-सी काली आकृति… जो धीरे-धीरे हर तस्वीर में बढ़ती जा रही थी।

उसे लगा यह उसकी कल्पना है, पर जैसे ही वह सीढ़ियाँ चढ़ने लगी, पीछे से दरवाज़ा बंद हो गया।

“धड़ाम!”

आरुषि चौंकी, लेकिन लेखक की हिम्मत में डर की जगह जिज्ञासा थी।


रात के 12 बजे, जब वह हवेली के पुस्तकालय में बैठी अपने नोट्स बना रही थी, तो एक खड़खड़ाहट हुई।

“खर्र… खर्र…”

पुस्तकें खुद-ब-खुद अलमारी से गिरने लगीं। एक पुरानी डायरी खुल गई जिसमें लिखा था:

“वो आती है आधी रात को… किसी की परछाई में छुपकर…”

उसके तुरंत बाद, सामने की खिड़की से किसी परछाई ने झाँका—ना चेहरा, ना आकार, सिर्फ़ काली धुँधली आकृति। उसकी साँसें तेज़ हो गईं।


आरुषि ने जैसे-तैसे खुद को सँभाला और हवेली के ऊपरी कमरे की ओर बढ़ी। वहां एक टूटी हुई अलमारी के सामने एक आईना था। उसने खुद को देखा—लेकिन… आईने में वह अकेली नहीं थी।

उसके पीछे एक और “आरुषि” खड़ी थी, पर चेहरा उल्टा था, आँखें काली और खून टपक रहा था।

“तू आई है… मेरी जगह लेने?” उसने फुसफुसाते हुए कहा।

आरुषि ने पलटकर देखा—पीछे कोई नहीं था।


गाँव वालों ने उसे खास तौर पर “वो कमरा” न खोलने की चेतावनी दी थी। हवेली के आखिरी हिस्से में लोहे की जंजीरों से जड़ा एक कमरा था।

उस पर लिखा था:

“यहाँ छाया बंद है। मत खोलो।”

पर आरुषि लेखक थी। चेतावनी उसके लिए जिज्ञासा बन गई।

उसने जंजीरें खोलीं।

अंदर एक बच्ची बैठी थी, सफ़ेद कपड़े में, रोती हुई।

“मुझे बचाओ…” बच्ची बोली।

आरुषि आगे बढ़ी, और जैसे ही उसने उसका हाथ पकड़ा…

बच्ची की आँखें काली हो गईं, मुँह से छाया निकलकर आरुषि के अंदर समा गई।


सुबह गाँव वाले हवेली के सामने जमा हो गए, क्योंकि किसी ने देखा था कि एक लड़की वहाँ रात में गई थी।

तभी हवेली का दरवाज़ा खुला।

आरुषि बाहर आई, शांत, मुस्कराती हुई।

“आप सबने सही कहा था। यहाँ कुछ नहीं है,” उसने कहा।

पर उसकी आँखें अब काली थीं। और उसकी परछाई… अब उसके साथ नहीं चल रही थी।


आरुषि ने अपनी किताब पूरी की—”छाया का कमरा”।

पर जिसने भी वह किताब पढ़ी, उसे सपने आने लगे।

सपनों में एक बच्ची कहती:

“अब अगली मैं बनूंगी।”

हर पाठक की परछाई बदलने लगी।

और अब…

तुमने ये कहानी पढ़ी है। खिड़की से बाहर झाँको… क्या तुम्हारी परछाई अभी भी वही है?

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