उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव में एक पुरानी हवेली थी, जिसे लोग “काली हवेली” कहते थे। कहते हैं वहाँ हर नई दुल्हन की पहली रात आख़िरी रात बन जाती थी।लेकिन शहर से आए आरव और उसकी नई पत्नी निशा इन बातों पर विश्वास नहीं करते थे।बारिश की रात थी।
बिजली बार-बार चमक रही थी। हवेली के लंबे गलियारों में अजीब सी ठंडी हवा घूम रही थी। शादी के बाद दोनों पहली बार उस कमरे में पहुँचे जिसे फूलों से सजाया गया था।कमरे का दरवाज़ा बंद होते ही अचानक हवेली की सारी लाइट चली गई।“शायद बिजली गई है…” निशा ने धीमे स्वर में कहा।आरव ने मोमबत्ती जलाई। उसकी रोशनी में दीवार पर एक और परछाई दिखी।लेकिन कमरे में तो सिर्फ़ दो लोग थे।निशा डर गई। उसने आरव का हाथ कसकर पकड़ लिया।तभी कमरे के बाहर पायल की आवाज़ सुनाई दी…छन… छन… छन…जैसे कोई औरत धीरे-धीरे दरवाज़े के पास आ रही हो।
आरव ने दरवाज़ा खोला। बाहर कोई नहीं था। बस लंबा अंधेरा गलियारा… और दीवार पर टंगी एक पुरानी तस्वीर।तस्वीर में एक दुल्हन थी।लाल साड़ी… बड़ी काली आँखें… और होंठों पर अजीब मुस्कान।निशा अचानक काँपने लगी।“ये वही चेहरा है… मैंने इसे सपने में देखा था…”तभी कमरे के अंदर से किसी के हँसने की आवाज़ आई।दोनों पीछे मुड़े—तस्वीर में मौजूद दुल्हन अब तस्वीर में नहीं थी।मोमबत्ती बुझ गई।कमरे में तेज़ सड़ांध फैल गई।
अंधेरे में किसी ने निशा के कान में फुसफुसाया—“आज मेरी सुहागरात पूरी होगी…”निशा चीख पड़ी।आरव ने मोबाइल की टॉर्च जलाई तो देखा— कमरे की छत पर एक औरत उल्टी लटकी हुई थी। उसके लंबे बाल नीचे झूल रहे थे और आँखें पूरी सफेद थीं।वो धीरे-धीरे नीचे उतरी…और मुस्कुराई।“तुम दोनों यहाँ से ज़िंदा नहीं जाओगे…”अचानक दरवाज़ा अपने-आप बंद हो गया।आरव पूरी ताकत से दरवाज़ा पीटने लगा, लेकिन बाहर से किसी ने जंजीर लगा दी थी।फिर कमरे में एक-एक करके सभी मोमबत्तियाँ खुद जल उठीं।और हर मोमबत्ती के सामने वही दुल्हन खड़ी थी।
दस… बीस… पचास…पूरा कमरा लाल साड़ियों वाली औरतों से भर गया।निशा रोने लगी।तभी असली दुल्हन जैसी दिखने वाली आत्मा आगे आई और बोली—“मेरे पति ने मुझे इसी रात मार दिया था… अब हर सुहागरात मेरी होगी…”अगली सुबह गाँव वालों ने कमरे का दरवाज़ा खोला।कमरा खाली था।बस फर्श पर पड़ा था एक टूटा हुआ मंगलसूत्र…और दीवार पर खून से लिखा था—“अगली सुहागरात का इंतज़ार रहेगा…”

