अंधेरी रात — निमिलिका
रात घनी थी, बादल छाए,दूर कहीं कुत्ते थे भौंकाए। पेड़ों से गिरती पत्तियाँ,जैसे हों भूतों की बातियाँ। टूटा मकान, चरमराया,दरवाज़ा […]
रात घनी थी, बादल छाए,दूर कहीं कुत्ते थे भौंकाए। पेड़ों से गिरती पत्तियाँ,जैसे हों भूतों की बातियाँ। टूटा मकान, चरमराया,दरवाज़ा […]
सुनसान रातें थीं, चाँद था काफ़ी दूर,और हवाओं में कोई पुरानी सिसकी सी घुली थी।मैं लौटी थी उस हवेली में,जहाँ
यह बारिश नहीं मेरी जान है,जिस पे लाखों लोग कुर्बान है,बूंदे जब गिरती है धरती पर यू लगता हैं जैसे
आधी रात की ठंडी सांसें,गूँज रही हैं खाली प्यासें।दीवारों से आती आहट,जैसे कोई कहे कोई बात अनजानी सी राहत। दरवाज़ा
_लक्ष्मी जायसवाल पीपल की छाँव तले मत जाना,बूढ़े लोग बार-बार समझाते थे।वो कहते—दिन में पेड़, रात में क़ैदखाना,जहाँ साया नहीं,
होकर दुनिया से दूर मैं,खामोश सी रहने लगी थी,जो था कोई अपना सा मेरा, अब उससे खफा सी थी।
✒️—Siddiqui Rukhsana सुनसान सी गलियों में, मैं खुद को ढूंढ रही हूं,क्या खो गई हूँ खुद में ,सवाल खुद से
—लक्ष्मी जायसवाल आधी रात को बजती घड़ी,हर साया लगता अनदेखी छड़ी। बत्ती जले तो बुझ जाए,पीछे कोई सांसें गिन जाए।
—सिद्दीकी रुखसाना एक भयानक रात अब्बा जान मैं जन्नत से बोल रही हूं,मैं आप की प्रिय बेटी लाडो बोल रही
नाम है मेरा माया – सिद्धिकी रुखसाना नाम है मेरा माया,मैं हूं दुसरे दुनियां की छाया ,जी हां नाम हैं