हिमालय की बर्फीली चोटियों और घने देवदार के जंगलों के बीच बसा बूँग गाँव कभी अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए जाना जाता था। लेकिन अब, उन ऊँचे पहाड़ों पर सिर्फ मौत का सन्नाटा और हवाओं में खौफ तैरता था। बूँग की इस दुर्दशा का कारण कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि उनके अपने ही राजा का एक स्वार्थी और खौफनाक फैसला था।सालों पहले, जब बूँग गाँव पर बाहरी कबीलों ने हमला किया था, तो गाँव का राजा हार की कगार पर था। अपनी गद्दी और गाँव को बचाने के लिए, राजा ने पहाड़ों की सबसे अंधेरी गुफा में सो रहे एक प्राचीन नरभक्षी राक्षस ‘बकासुर’ को जगा दिया। बकासुर ने दुश्मनों को तो गाजर-मूली की तरह काट डाला, लेकिन इसके बदले में उसने राजा के सामने एक रोंगटे खड़े कर देने वाली शर्त रखी:
“हर महीने की अमावस्या की रात को, मुझे भोजन के रूप में गाँव का एक ज़िंदा इंसान चाहिए। जिस दिन बलि नहीं मिलेगी, मैं पूरे बूँग गाँव को चबा जाऊँगा!”
राजा ने अपनी जान बचाने के लिए यह भयानक शर्त मान ली। तब से, हर अमावस्या को गाँव का कोई न कोई घर उजड़ जाता था।क्रंदन और एक शूरवीर का आगमनएक शाम, जब आसमान में काले बादल छाए थे, अनुराग नाम का एक साहसी और रहस्यमयी विद्याओं का ज्ञाता बूँग गाँव पहुँचा। पहाड़ों के कठिन रास्तों की यात्रा करने के बाद, वह एक जगह विश्राम करना चाहता था। लेकिन जैसे ही उसने गाँव में कदम रखा, उसे एक घर से दिल चीर देने वाली चीखें और रोने की आवाज़ें सुनाई दीं।अनुराग उस घर के पास गया। वहाँ एक बेबस पिता अपनी जवान बेटी के पैरों में गिरकर रो रहा था, और गाँव के सैनिक उस लड़की को घसीट कर ले जा रहे थे। आज अमावस्या की रात थी, और बलि के लिए उस लड़की को चुना गया था।
जब अनुराग ने गाँव वालों और पश्चाताप की आग में जल रहे बूढ़े राजा से यह खूनी इतिहास सुना, तो उसका खून खौल उठा। उसने राजा की आँखों में आँखें डालकर कड़कती आवाज़ में कहा,”एक राजा का धर्म प्रजा की रक्षा करना होता है, उन्हें मौत के मुँह में धकेलना नहीं। आज रात बलि की वेदी पर यह मासूम नहीं, बल्कि मैं जाऊँगा। आज उस नरभक्षी का आखिरी दिन होगा!”
अमावस्या का घना अंधकार पूरे पहाड़ों को निगल चुका था। कड़ाके की ठंड और चीरती हुई बर्फीली हवाओं के बीच, अनुराग अकेले ही मौत की उस गुफा की ओर बढ़ रहा था। उसने अपने साथ कुछ खास चीजें रख ली थीं:भस्म और अभिमंत्रित रुद्राक्ष: बुरी शक्तियों को रोकने के लिए।अघोर जंजीर: जो किसी भी दानव को बांध सकती थी।एक दिव्य त्रिशूल: जिसे उसने सालों की तपस्या के बाद हासिल किया था।
गुफा के बाहर का नज़ारा किसी भी इंसान का दिल दहला देने के लिए काफी था। चारों तरफ इंसानी खोपड़ियाँ और कंकाल बिखरे पड़े थे। ज़मीन का रंग जमे हुए खून की वजह से काला पड़ चुका था। हवा में सड़े हुए मांस की ऐसी दुर्गंध थी कि सांस लेना भी मुश्किल हो रहा था।गुफा के अंदर से हड्डियाँ चबाने की ‘कड़क-कड़क’ आवाज़ें आ रही थीं।अनुराग ने गुफा के द्वार पर खड़े होकर ज़ोर से ललकारा, “बाहर आ बकासुर! आज तेरा भोजन खुद चलकर तेरे पास आया है!”
गुफा के अंदर से एक भारी, गड़गड़ाती हुई आवाज़ आई जिससे पहाड़ की ज़मीन कांप उठी। अँधेरे को चीरता हुआ बकासुर बाहर आया।वह पंद्रह फुट ऊँचा एक विशालकाय दानव था। उसकी आँखें धधकते हुए कोयले जैसी लाल थीं, उसके मुँह से लार टपक रही थी, और उसके दाँत किसी जंगली सुअर की तरह नुकीले और बाहर की तरफ निकले हुए थे। उसके हाथों के नाखून छुरे जितने लंबे और खून से सने थे।”एक मामूली इंसान? तू मेरे भूख की आग क्या बुझाएगा!” बकासुर हँसा, और उसकी हँसी से आस-पास के पेड़ों से बर्फ नीचे गिर पड़ी।हमला और बचावबकासुर ने एक झपट्टे में अनुराग को पकड़ने की कोशिश की, लेकिन अनुराग ने गज़ब की फुर्ती दिखाते हुए छलांग लगाई और दानव के पंजों के नीचे से खिसक गया। दानव का हाथ पहाड़ की चट्टान पर लगा और चट्टान टूटकर चकनाचूर हो गई।
अनुराग को समझ आ गया कि इस विशाल दानव से ताकत से नहीं, बल्कि बुद्धि से जीतना होगा। बकासुर ने एक बड़ा पत्थर उठाकर अनुराग की तरफ फेंका। अनुराग ने हवा में ही अपनी ‘अघोर जंजीर’ फेंकी, जिसने पत्थर को बीच में ही चकनाचूर कर दिया।खौफनाक प्रहार….,गुस्साए दानव ने अपनी पूरी ताकत से अनुराग पर हमला किया। उसकी एक ज़ोरदार लात अनुराग के सीने पर लगी, जिससे अनुराग कई फुट दूर जाकर बर्फ में गिरा। उसके मुँह से खून निकल आया। दानव उसे कुचलने के लिए आगे बढ़ा, लेकिन अनुराग ने तुरंत अपनी जेब से अभिमंत्रित भस्म निकाली और बकासुर की लाल आँखों में फेंक दी।भस्म लगते ही बकासुर का चेहरा जलने लगा और वह दर्द से चीखने लगा। उसकी चीख इतनी भयानक थी कि मीलों दूर बूँग गाँव के लोग भी कांप उठे।
बकासुर का अंत…दानव दर्द से छटपटा रहा था, लेकिन उसका गुस्सा अब सातवें आसमान पर था। वह अंधाधुंध अपने हाथ-पैर मार रहा था। इसी पल का फायदा उठाते हुए, अनुराग ने अपनी अघोर जंजीर निकाली और उसे बकासुर के पैरों में फंसाकर ज़ोर से खींचा। पंद्रह फुट का वह विशाल दानव एक ज़ोरदार धमाके के साथ ज़मीन पर गिर पड़ा।इससे पहले कि बकासुर संभल पाता, अनुराग ने अपना चमकता हुआ दिव्य त्रिशूल निकाला। उसने भगवान शिव का स्मरण किया और एक ऊँची छलांग लगाते हुए पूरी ताकत से त्रिशूल को बकासुर के विशाल सीने में गाड़ दिया।”आआआआह्ह्ह…!”बकासुर की वह आखिरी चीख पहाड़ों को चीरती हुई आसमान में गूंज गई। उसके शरीर से काले रंग का गाढ़ा खून फव्वारे की तरह निकला और पल भर में ही वह खूंखार नरभक्षी एक निर्जीव, बदबूदार मांस के लोथड़े में बदल गया। उसका अंत हो चुका था।
अगली सुबह, जब सूरज की किरणें बूँग गाँव के ऊँचे पहाड़ों पर पड़ीं, तो वे एक नई उम्मीद लेकर आईं। अनुराग खून से लथपथ, लेकिन सीना ताने पहाड़ से नीचे उतरा।उसे ज़िंदा देखकर पूरे गाँव की आँखें फटी की फटी रह गईं। राजा, जो अपने पापों के बोझ तले दबा था, दौड़कर आया और अनुराग के पैरों में गिर पड़ा।”तुम इंसान नहीं, हमारे लिए देवता बनकर आए हो। तुमने मेरे पाप का अंत कर दिया,” राजा रोते हुए बोला।अनुराग ने उसे उठाते हुए कहा, “मुखिया जी, डर से किया गया समझौता हमेशा बर्बादी लाता है। अब ये गाँव आज़ाद है।”उस दिन बूँग गाँव में दीवाली जैसा जश्न मनाया गया। जो पहाड़ कल तक खौफ और मौत के लिए जाने जाते थे, आज वे अनुराग की बहादुरी के गीतों से गूंज रहे थे। बूँग का वह खूनी इतिहास हमेशा के लिए खत्म हो गया, और अनुराग का नाम उन पहाड़ों पर एक अमर शूरवीर की तरह हमेशा के लिए दर्ज हो गया।
