बीरौंखाल का अभिशाप – अनुराग बौराई

खौफनाक सफर और रूह कंपा देने वाले दृश्य…अमावस की रात थी। आसमान में घना कोहरा छाया हुआ था। अनुराग ने अपनी पीठ पर एक मजबूत बैग बाँधा, जिसमें प्रेत-बाधा से लड़ने का कुछ खास सामान था-गंगाजल और सिद्ध भभूततिलस्मी लाल धागाएक प्राचीन सिद्ध खंजर (जिस पर मंत्र उकेरे गए थे)उसने काली पहाड़ी की ओर अपने कदम बढ़ा दिए। रास्ता बहुत ही डरावना था। हवाओं के चलने से पेड़ों के पत्तों की सरसराहट ऐसी लग रही थी मानो कोई कान में फुसफुसा रहा हो “लौट जाओ अनुराग… यहाँ तुम्हारी कब्र खुदी है।”अचानक, जंगल का माहौल बदल गया। पेड़ों की डालियों से पानी नहीं, बल्कि गाढ़ा लाल खून टपकने लगा। अनुराग के कदमों के नीचे सूखी पत्तियाँ नहीं, बल्कि कुचली जा रही हड्डियों की आवाज़ आने लगी। तभी उसे एक औरत के रोने की आवाज़ सुनाई दी। कोहरे के बीच से एक सफेद साड़ी पहने औरत उसकी तरफ पीठ किए बैठी थी।

लेकिन बीरौंखाल की यह काली रात तब छंटने वाली थी, जब वहाँ अनुराग का आगमन हुआ।अनुराग एक निडर, साहसी और रहस्यमयी अघोर विद्याओं का जानकार युवक था। उसे रोमांच और अज्ञात खतरों से खेलने का शौक था। जब वह बीरौंखाल पहुँचा और उसने गाँव वालों की दर्दनाक दास्तान सुनी, तो उसका खून खौल उठा। एक बूढ़ी माँ को अपने इकलौते बेटे के लिए बिलखते देख, अनुराग ने उसी वक्त कसम खाई कि वह इस प्रेत का अंत करेगा और उन सभी कैद आत्माओं को आज़ाद कराएगा।

खौफनाक सफर और रूह कंपा देने वाले दृश्य…अमावस की रात थी। आसमान में घना कोहरा छाया हुआ था। अनुराग ने अपनी पीठ पर एक मजबूत बैग बाँधा, जिसमें प्रेत-बाधा से लड़ने का कुछ खास सामान था-गंगाजल और सिद्ध भभूततिलस्मी लाल धागाएक प्राचीन सिद्ध खंजर (जिस पर मंत्र उकेरे गए थे)उसने काली पहाड़ी की ओर अपने कदम बढ़ा दिए। रास्ता बहुत ही डरावना था। हवाओं के चलने से पेड़ों के पत्तों की सरसराहट ऐसी लग रही थी मानो कोई कान में फुसफुसा रहा हो “लौट जाओ अनुराग… यहाँ तुम्हारी कब्र खुदी है।”अचानक, जंगल का माहौल बदल गया। पेड़ों की डालियों से पानी नहीं, बल्कि गाढ़ा लाल खून टपकने लगा। अनुराग के कदमों के नीचे सूखी पत्तियाँ नहीं, बल्कि कुचली जा रही हड्डियों की आवाज़ आने लगी। तभी उसे एक औरत के रोने की आवाज़ सुनाई दी। कोहरे के बीच से एक सफेद साड़ी पहने औरत उसकी तरफ पीठ किए बैठी थी।

“मदद करो…” वह सिसक रही थी।जैसे ही अनुराग सतर्क होकर आगे बढ़ा, उस औरत ने अपनी गर्दन को 180 डिग्री पर घुमा लिया। उसका चेहरा आधा सड़ा हुआ था और आँखों की जगह सिर्फ काले गड्ढे थे। वह एक भयानक चीख मारते हुए हवा में उड़ी और अनुराग पर झपटी। अनुराग ने बिना समय गंवाए अपनी जेब से सिद्ध भभूत निकाली और मंत्र पढ़कर उसकी ओर फेंक दी। भभूत के स्पर्श से वह डायन आग की लपटों में घिर गई और कोयले में तब्दील हो गई।

हवेली का खौफनाक रहस्यतमाम भयानक बाधाओं को पार करते हुए अनुराग उस मनहूस हवेली के मुख्य द्वार तक पहुँच गया। जैसे ही उसने अंदर कदम रखा, पीछे से भारी लोहे का दरवाजा एक जोरदार आवाज़ के साथ बंद हो गया।अंदर का नज़ारा रोंगटे खड़े कर देने वाला था। दीवारों पर टंगी पुरानी तस्वीरों की आँखों से खून बह रहा था। अचानक, हवेली की छत से इंसानी कटे हुए अंगों से बना एक विशाल मकड़े जैसा जीव नीचे गिरा। वह जीव छत और दीवारों पर रेंगते हुए अनुराग की तरफ आ रहा था। उसके कई मुँह थे जो एक साथ गाँव वालों की आवाज़ में मदद की भीख मांग रहे थे, ताकि अनुराग का ध्यान भटके।अनुराग ने अपनी आँखें बंद कीं, अपने मन को स्थिर किया और अपने हाथ में तिलस्मी लाल धागा लपेटकर एक जोरदार मुक्का ज़मीन पर मारा। वहाँ से एक नीली आग की लहर उठी जिसने उस घिनौने जीव को जलाकर राख कर दिया।

अब अनुराग के कदम तहखाने की ओर बढ़ रहे थे। सीढ़ियाँ उतरते ही उसे अजीब सी सिसकियाँ और सड़े हुए मांस की असहनीय दुर्गंध आने लगी।आत्माओं का तहखाना और महासंग्रामतहखाने का नज़ारा किसी नरक से कम नहीं था। वहाँ हवा में लटकते हुए दर्जनों जादुई पिंजरे थे, जिनमें बीरौंखाल के मासूम गाँव वालों की आत्माएँ नीली रोशनी के रूप में तड़प रही थीं। तभी, तहखाने का तापमान अचानक शून्य से नीचे गिर गया। दीवारों से बर्फ जमने लगी।तहखाने के बीचों-बीच रखे एक बड़े से कुंड में उबलते हुए काले खून में से कपालिक बाहर आया।उसका शरीर 8 फीट लंबा और कंकाल नुमा था। उसके शरीर पर सड़ा हुआ मांस झूल रहा था और उसके गले में इंसानी खोपड़ियों की माला थी। उसके बाएँ हाथ में एक चमकती हुई खोपड़ी थी, जिससे भयानक काली ऊर्जा निकल रही थी।

“अनुराग… तू मेरे भोजन का निवाला बनने खुद चला आया!” कपालिक की आवाज़ अनुराग के दिमाग में गूंजी, जिससे उसके कानों से हल्का खून रिसने लगा।अनुराग ने बिना कोई खौफ दिखाए अपना खंजर निकाला और कहा, “मैं बीरौंखाल का अभिशाप मिटाने आया हूँ, और आज तेरी चिता यहीं इसी तहखाने में जलेगी।”कपालिक ने एक भयानक अट्टहास किया और अपनी काली शक्तियों से अनुराग पर हमला कर दिया। ज़मीन फाड़कर दर्जनों कंकाल बाहर निकल आए और उन्होंने अनुराग को पकड़ने की कोशिश की। अनुराग ने फुर्ती से उन कंकालों को अपने खंजर से काटना शुरू किया।कपालिक ने अपनी शक्तियों से हवा को जहरीले धुएं में बदल दिया, जिससे अनुराग का दम घुटने लगा। प्रेत ने अपने पंजों से अनुराग की गर्दन दबोच ली और उसे हवा में उठा लिया। प्रेत के ठंडे, सड़े हुए हाथ जैसे ही अनुराग की जान निकालने वाले थे, अनुराग ने अपनी आखिरी हिम्मत बटोरी। उसने अपने बैग से गंगाजल की शीशी निकाली और उसे अपने दांतों से खोलकर सीधा प्रेत की लाल चमकती आँखों में उड़ेल दिया।

प्रेत का अंत और बीरौंखाल की मुक्तिगंगाजल के स्पर्श से कपालिक दर्द से तड़प उठा और उसकी पकड़ ढीली पड़ गई। नीचे गिरते ही, अनुराग को समझ आ गया था कि इस शैतान की जान उस चमकती हुई खोपड़ी में है।अनुराग ने पूरी ताकत से छलांग लगाई और अपना मंत्र सिद्ध खंजर सीधा उस काली खोपड़ी के बीचों-बीच गाड़ दिया।”नहीं…..!”एक गगनभेदी चीख के साथ एक जोरदार धमाका हुआ। खोपड़ी के टूटते ही हवेली में एक अंधा कर देने वाली सफेद रोशनी फैल गई। कपालिक का शरीर टुकड़ों में फटने लगा और देखते ही देखते, वह खौफनाक प्रेत काली राख के ढेर में तब्दील हो गया।उसके मरते ही तहखाने में मौजूद सभी जादुई पिंजरे टूट गए। कैद आत्माएँ आज़ाद हो गईं। उन नीली रोशनियों ने अनुराग के चारों ओर एक सम्मानजनक चक्कर लगाया और फिर शांति से आकाश की ओर विलीन हो गईं। हवेली का दमघोंटू माहौल एकदम हल्का और पवित्र हो गया।

जब अनुराग सुबह की पहली किरण के साथ बीरौंखाल लौटा, तो पूरा गाँव उसे देखकर हैरान रह गया।अनुराग ने सरपंच को बताया कि अब कपालिक का साया हमेशा के लिए खत्म हो चुका है और बीरौंखाल के अपनों की आत्माओं को शांति मिल गई है। पूरा गाँव खुशी के मारे रो पड़ा। महिलाओं ने अनुराग की आरती उतारी और बच्चों ने उसे कंधे पर उठा लिया। बीरौंखाल जो कभी खौफ का दूसरा नाम था, अब अनुराग की बदौलत फिर से एक खुशहाल और आज़ाद गाँव बन चुका था। और इस तरह, बीरौंखाल के इतिहास में अनुराग का नाम एक अमर रक्षक के रूप में हमेशा के लिए दर्ज हो गया।

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