चाटी गाँव का श्राप
मेरा नाम रणदीप जरल है, और मैं जो कहानी सुनाने जा रहा हूँ, उसे सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएँगे।यह कहानी उस समय की है जब हम चंबा की खूबसूरत वादियों में बसी एक यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे थे। मेरे माता-पिता वैसे तो हमारे पुश्तैनी गाँव, चाटी के रहने वाले थे, लेकिन सालों पहले वे हमेशा के लिए वहाँ से मुंबई जाकर बस गए थे। उस गाँव में एक डरावनी कहानी मशहूर थी: कहा जाता था कि एक रहस्यमयी, राक्षसी शक्ति—जिसे ‘रथ पिशाचिनी’ कहा जाता था—अंधेरे का फ़ायदा उठाकर घरों में घुसती थी और वहाँ रहने वालों का खून पी जाती थी। तब मैं इतना छोटा था कि इन कहानियों की गंभीरता को समझ नहीं पाता था, लेकिन इसी डर की वजह से मेरे माता-पिता ने गाँव हमेशा के लिए छोड़ दिया था।
समय बीतता गया; मैं हॉस्टल में रहने लगा और मेरे तीन पक्के दोस्त बने—सोहन, राडी और रिंकू। हमारी दोस्ती इतनी गहरी थी कि पूरा कॉलेज हमें “चार दोस्त” कहकर बुलाता था। लोग मज़ाक-मज़ाक में कहते थे कि एक दिन हम चारों में से सिर्फ़ एक ही ज़िंदा बचेगा, लेकिन तब हम इसे सिर्फ़ मज़ाक समझकर टाल देते थे।चार साल तेज़ी से बीत गए, और अपने आखिरी सेमेस्टर की गर्मियों की छुट्टियों के दौरान हमने एक ट्रिप का प्लान बनाया। राडी गोवा जाना चाहती थी, और रिंकू व सोहन भी सहमत थे, लेकिन तभी मेरे मन में अपने पुराने गाँव, चाटी, जाने का विचार आया। राडी, रिंकू और मैं भगवान या अलौकिक शक्तियों में ज़्यादा यकीन नहीं रखते थे, जबकि सोहन बहुत धार्मिक था और ऐसी चीज़ों पर पक्का विश्वास करता था।मैंने सभी को चाटी गाँव चलने के लिए मनाना शुरू किया। रिंकू ने हंसते हुए कहा, “यार रणदीप, वहाँ जाकर क्या करेंगे? क्या वहाँ कोई भूत-प्रेत से मुलाकात करवानी है?” मैंने जवाब दिया, “हाँ भाई, मैं तुम सबको चाटी गाँव ले जाकर साबित कर दूँगा कि भूत-प्रेत जैसी कोई चीज़ नहीं होती, सब बकवास है।” यह सुनते ही सोहन का चेहरा डर के मारे पीला पड़ गया। उसने हाथ जोड़कर कहा, “पागल मत बनो रणदीप! मैंने उस गाँव और ‘रथ पिशाचिनी’ के बारे में बहुत कुछ सुना है। वहाँ जाना मौत के मुँह में जाने जैसा है। प्लीज, प्लान बदल दो।” राडी ने उसका मज़ाक उड़ाते हुए कहा, “अरे सोहन, तू भी किस ज़माने की दकियानूसी बातों में फंसा है? चलो, थोड़ा एडवेंचर करते हैं!” सोहन ने हमें रोकने की बहुत कोशिश की, लेकिन हमने उसकी एक न सुनी। आखिरकार, वह भारी मन से साथ चलने के लिए तैयार हो गया।कई घंटों के सफ़र के बाद, हम शाम करीब 7:30 बजे गाँव के इकलौते होटल पहुँचे। होटल के मालिक ने हमें चाबी देते हुए चेतावनी दी कि रात 8:00 बजे के बाद कोई भी जंगल की सड़क की तरफ़ नहीं जाता था, और बाहर निकलना सख़्त मना था। रिंकू ने दबी आवाज़ में सोहन से कहा, “देख सोहन, तेरे जैसे डरपोक यहाँ भी भरे पड़े हैं।” हमें मालिक की बात अजीब लगी, लेकिन हमने उसे नज़रअंदाज़ कर दिया। रात के 11:30 बजे, हम चारों चुपके से होटल से निकले और जंगल वाली सड़क पर पहुँच गए। सड़क की शुरुआत में एक पुराना साइनपोस्ट और पास ही एक छोटा सा मंदिर था। हम आगे बढ़ते रहे। करीब बीस मिनट तक सब कुछ सामान्य रहा; हम कार में पुराने गाने सुन रहे थे और हँसी-मज़ाक कर रहे थे।तभी हल्की बारिश शुरू हुई और अचानक, सड़क के बीचों-बीच एक बेहद खूबसूरत औरत दिखाई दी। उसने हाथ उठाकर हमें रुकने का इशारा किया। उसकी खूबसूरती इतनी मोहक थी कि एक पल के लिए रिंकू और मैं मंत्रमुग्ध रह गए। वह कार के पास आई, मुस्कुराई और बोली, “भैया… प्लीज़ मुझे लिफ़्ट दे दीजिए।”तभी पीछे बैठे सोहन ने कांपती आवाज़ में चिल्लाकर कहा, “रणदीप! इसे लिफ़्ट मत देना… यह वही चुड़ैल है!” रिंकू ने उसे डांटते हुए कहा, “चुप रह सोहन, इतनी रात को एक अकेली लड़की को ऐसे बीच जंगल में कैसे छोड़ दें?” हमने सोहन की बात पर कोई ध्यान नहीं दिया।जैसे ही रिंकू ने कार का दरवाज़ा खोला, उस औरत का चेहरा अचानक भयानक रूप में बदल गया। उसकी आँखें दहकते अंगारों की तरह चमकने लगीं, उसकी गर्दन अजीब तरह से मुड़ गई, उसका शरीर सिकुड़ गया और लंबे, नुकीले पंजे बाहर निकल आए। अगले ही पल, वह रिंकू पर झपटी और बेरहमी से उसकी छाती नोचने लगी।हम तीनों डर के मारे जम गए थे। फिर, रिंकू की दर्दनाक चीख ने मुझे हकीकत में वापस लाया।
मैंने पूरी ताकत से उसे लात मारी और वह ज़मीन पर गिर गई, लेकिन तब तक रिंकू बुरी तरह घायल हो चुका था।गुस्से में मैं कार से बाहर कूदा, लेकिन एक अदृश्य शक्ति ने मुझे पकड़ लिया और कई फ़ीट दूर एक चट्टान पर दे मारा। मेरा सिर फट गया और खून बहने लगा। तभी मैंने देखा कि उस चुड़ैल ने सोहन की गर्दन पकड़ रखी थी और उसे हवा में लटका रखा था, जबकि वह दर्द से तड़प रहा था। उसी पल, राडी भी उसके चंगुल में फँस गई।अपनी बची-खुची ताकत जुटाकर मैंने उसे पीछे से धक्का दिया। वह एक पल के लिए गिरी लेकिन तुरंत फिर से उठ खड़ी हुई, उसका रूप पहले से भी ज़्यादा डरावना हो गया था। उसने अपने पंजों से मेरा गला जकड़ लिया, मुझे हवा में उछाल दिया और मैं एक बड़ी चट्टान से जा टकराया।दर्द से तड़पते हुए और जमीन पर रेंगते हुए, मेरी नज़र सड़क के किनारे खड़े उसी पुराने साइनपोस्ट पर पड़ी।
अचानक मुझे याद आया कि गाँव वाले कहते थे कि वह उस निशान से आगे कभी नहीं जाती। अपनी बची-खुची ताकत जुटाकर, मैं खुद को उस सीमा की ओर घसीटने लगा। इस जद्दोजहद में काफी समय बीत चुका था। *रथ पिशाचिनी* पीछे से तेज़ी से मेरी ओर उड़ती हुई आ रही थी; वह बस दो कदम की दूरी पर थी।पूरी ताकत लगाकर, मैंने एक आखिरी छलांग लगाई और साइनपोस्ट से बनी सीमा को पार कर लिया। ठीक उसी पल, वह अचानक रुक गई, जैसे किसी अदृश्य ताकत ने उसे रोक रखा हो। गुस्से में दहाड़ते हुए उसने कहा, “भागो, रणदीप… आज तो तुम बच गए। लेकिन याद रखना… अगली बार मैं तुम्हें ज़िंदा नहीं छोड़ूँगी।”मैं कांपते हुए उसे देखता रहा। मेरी साँसें उखड़ रही थीं, सिर से खून बह रहा था, और मेरी आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा था। इस भयानक संघर्ष के बाद अब रात के लगभग दो बज रहे थे। धीरे-धीरे मेरी चेतना खत्म होने लगी, और आखिरकार, मेरी आँखें बंद हो गईं।क्या मैं सचमुच मर चुका था? क्या मेरे दोस्त रिंकू, सोहन और राडी हमेशा के लिए चले गए थे? वह रहस्यमयी सीमा क्या थी जिसे *रथ पिशाचिनी* पार नहीं कर सकती थी? उस पुराने साइनपोस्ट और मंदिर के पीछे क्या राज़ छिपा था? इन सभी सवालों के जवाब कहानी के अगले हिस्से में मिलेंगे।


