कहा जाता है कि हर रेलवे स्टेशन पर एक ऐसा प्लेटफॉर्म होता है,जो नक़्शे में नहीं दिखता…जो सिर्फ़ उसी इंसान को दिखाई देता है,जिसकी वापसी तय नहीं होती।आदित्य इन बातों पर कभी यक़ीन नहीं करता था।उस रात उसे आख़िरी ट्रेन से घर लौटना था।हल्की बारिश हो रही थी।स्टेशन लगभग खाली था।मोबाइल में नेटवर्क नहीं था और घड़ी एक ही समय पर अटकी हुई थी — 12:17।तभी लाउडस्पीकर पर आवाज़ गूँजी —“यात्रीगण ध्यान दें… आख़िरी लोकल प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर आ रही है।”आदित्य चौंक गया।इस स्टेशन पर तो सिर्फ़ 6 प्लेटफॉर्म थे।फिर भी उसके कदम अपने-आप आगे बढ़ने लगे।प्लेटफॉर्म नंबर 7 पर पहुँचते ही हवा अचानक ठंडी हो गई।बारिश रुक चुकी थी।सामने एक पुरानी, जंग लगी ट्रेन खड़ी थी।ट्रेन के अंदर बैठे लोग बिल्कुल स्थिर थे —ना कोई हिल रहा था, ना कोई बोल रहा था।पीछे से भारी आवाज़ आई —“टिकट दिखाओ।”वो एक बूढ़ा टिकट चेकर था।उसकी वर्दी बहुत पुरानी थी औरउसकी आँखों में पुतलियाँ नहीं थीं — सिर्फ़ सफ़ेद।आदित्य ने काँपती आवाज़ में कहा,“मेरे पास टिकट नहीं है।”बूढ़ा हल्का-सा मुस्कुराया —“इस ट्रेन में टिकट नहीं चाहिए… बस चढ़ना होता है।”दरवाज़ा अपने-आप खुल गया।जैसे ही आदित्य अंदर गया,दरवाज़ा ज़ोर से बंद हो गया।लाइटें झपकीं और फिर जल उठीं।अब आदित्य साफ़ देख पा रहा था —डिब्बे में बैठे लोग ज़िंदा नहीं थे।किसी की गर्दन टूटी हुई थी,किसी की आँखों से कीड़े रेंग रहे थे,किसी का आधा शरीर गायब था।एक छोटी बच्ची ने उसकी ओर देखकर पूछा —“आप भी मर गए क्या?”आदित्य की साँस रुकने लगी।उसकी आँखें लाल होने लगीं।हाथ-पैर अपने-आप मरोड़ने लगे,जैसे कोई अदृश्य ताक़त उसे काबू में ले रही हो।लाउडस्पीकर फिर बोला —“अगला स्टेशन… आख़िरी प्लेटफॉर्म।”खिड़की में आदित्य ने खुद को देखा —लेकिन वो अब उसका चेहरा नहीं था।वो उसी बूढ़े टिकट चेकर जैसा दिखने लगा था।अचानक ज़ोर का झटका लगा।आदित्य ट्रेन से नीचे गिर पड़ा।सुबह हो चुकी थी।स्टेशन बिल्कुल सामान्य था।लोग आ-जा रहे थे, ट्रेनें चल रही थीं।आदित्य घर पहुँचा।माँ ने दरवाज़ा खोला —“आ गया बेटा? इतनी देर क्यों हो गई?”आदित्य मुस्कुराया…लेकिन आईने में उसका कोई प्रतिबिंब नहीं था।रात होते ही अजीब घटनाएँ शुरू हो गईं।दीवारों से खरोंचने की आवाज़ें आने लगीं।हर रात 12:17 पर घर की सारी घड़ियाँ एक साथ रुक जातीं।एक रात माँ की नींद खुली।कमरे से धीमी फुसफुसाहट आ रही थी।दरवाज़ा खोला तो देखा —आदित्य छत से उल्टा लटका हुआ था।उसकी आँखें पूरी तरह सफ़ेद थींऔर होंठों पर अजीब-सी मुस्कान थी।माँ की चीख गूँज उठी।सुबह होते-होते आदित्य गायब हो चुका था।पुलिस को कोई सुराग नहीं मिला।उसी रात,रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 7 परएक नया यात्री खड़ा था।बिल्कुल आदित्य जैसा।पीछे से वही भारी आवाज़ आई —“टिकट दिखाओ।”और ट्रेन एक बार फिर चल पड़ी।
