तीन दिन से लगातार बारिश हो रही थी।गाड़ी के टायर गीली सड़क पर फिसलते हुए आगे बढ़ रहे थे और शीशे पर गिरती बारिश की बूँदें हल्की-हल्की आवाज़ कर रही थीं।अर्जुन गाड़ी चला रहा था।पीछे रोहन और कबीर बैठे थे।नेहा, पूजा और सिया खिड़की से बाहर अंधेरे पहाड़ों को देख रही थीं।इंजन की लगातार गूँज और बारिश का शोर पूरे माहौल को भारी बना रहा था।कोई adventure का प्लान नहीं था। बस यूँ ही निकल पड़े थे।लेकिन पहाड़ों की तरफ़ जाते हुए एक गलत मोड़ ने सब बदल दिया।अचानक मोबाइल स्क्रीन पर “No Network” दिखा और GPS की आवाज़ बंद हो गई।गाड़ी आगे बढ़ती रही।कुछ देर बाद बारिश में आधा छुपा हुआ एक पुराना बोर्ड दिखाई दिया।गाड़ी धीमी हुई, ब्रेक की हल्की चरमराहट सुनाई दी।बोर्ड पर लिखा था—“⚠️ आगे श्रापित गाँव है,सूरज ढलने के बाद जाना मना है।”चारों तरफ़ हवा में पेड़ों के पत्तों की सरसराहट तेज़ हो गई।पूजा ने कहा, “यहीं रुकते हैं…”लेकिन पीछे देखा तो कीचड़ में धँसी सड़क से पानी की छप-छप की आवाज़ आ रही थी।पीछे लौटना नामुमकिन था।गाड़ी फिर से चली।थोड़ी ही दूर एक छोटा-सा गाँव दिखाई दिया।गाड़ी रुकते ही इंजन की आवाज़ अचानक खामोश हो गई।टूटे हुए घर।बंद दरवाज़े।और पास में बहती एक चौड़ी नदी।अजीब बात ये थी कि बारिश होते हुए भी गाँव के अंदर बारिश की आवाज़ नहीं आ रही थी।बस दूर से नदी के बहने की गहरी आवाज़ सुनाई दे रही थी।तभी नदी की तरफ़ से किसी लड़की के रोने जैसी धीमी आवाज़ आई।आवाज़ ऐसी थी जैसे कोई बहुत देर से इंतज़ार कर रहा हो।सबने मुड़कर देखा।नदी के बीच एक लड़की सफ़ेद कपड़ों में खड़ी थी।पानी उसके पैरों से टकरा रहा था, लेकिन वो हिल नहीं रही थी।कबीर ने धीरे से कहा—“उसका साया… उसका साया नहीं है।”उसी पल हवा एकदम रुक गई।पेड़ों की सरसराहट बंद हो गई।लड़की ने हल्की-सी मुस्कान दी।और उसी पल बारिश रुक गई।गाँव के घरों के दरवाज़े किर्र-किर्र की हल्की आवाज़ के साथ एक-एक करके खुलने लगे।अंदर से किसी के कदमों की आवाज़ नहीं थी।लड़की बोली—“यह गाँव हर बारिश में नदी से कुछ लेता है…”उसकी आवाज़ नदी की गूँज में घुल गई।“…और बदले में ज़िंदा रहता है।”अचानक नदी का बहाव तेज़ हो गया।पानी किनारों से ऊपर चढ़ने लगा।पानी की ज़ोरदार आवाज़ अब चारों तरफ़ थी।भागने का रास्ता धीरे-धीरे पानी बन गया।किसी ने चिल्लाया नहीं।बस तेज़ साँसों की आवाज़ और नदी का शोर।सब कुछ बहुत शांति से खत्म हो गया।सुबह—हल्की हवा की आवाज़ थी।नदी बिल्कुल शांत थी।किनारे पर छह बैग पड़े थे।छह मोबाइल।दूर कहीं एक कौए की आवाज़ गूँजी।और उसी जगह जहाँ रात में कुछ भी नहीं था—अब एक छोटा-सा गाँव था।गाँव के बाहर एक नया बोर्ड हवा में हल्का हिलता हुआ दिखाई दिया—“⚠️ आगे श्रापित गाँव है,रात में जाना मना है।”हवा चली।पेड़ों के पत्ते फिर से सरसराने लगे।गाँव शांत था…जैसे उसने अपना हिस्सा पा लिया हो।
