रात की चीख

कविता: “रात की चीख़”

लेखक: अंकित शर्मा

रात ढली, गांव की गलियाँ सुनसान,

हवा में घुली थी डर की बेज़बान दास्तान।

पुरानी कुएँ के पास, किसी ने देखा परछाई,

जैसे कोई अतीत की आत्मा, कर रही हो सदा पाई।

सन्नाटे में अचानक आई चीख़,किसी की या परछाई की, पता न चला ठीक।खेतों की पत्तियाँ हिली,

पेड़ कांपे जोर से,रात ने पहन लिया था डर का काला मँडराया शोर से।

मैंने हाथ बढ़ाया, कांपते हुए कदमों से,पर कोई न मिला, सिर्फ़ हवा गूँज रही थी लहरों में।

दीवारों पर उभरी, अदृश्य आँखों की छाया,हर कोने में फुसफुसाई – “तुम अकेले नहीं यहाँ।

“सुबह आई तो गांव सोया, चिड़ियों की चहक सुनाई,पर रात की चीख़ अब भी कानों में गूँजती रही कहीं।

किसने कहा था, कौन था? अब भी रहस्य बना,रात की उस चीख़ ने, मन में डर की आग जला दी हमेशा।

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