मकान नम्बर 13
प्रयागराज की एक पुरानी बस्ती में मकान नम्बर 13 वर्षों से खाली पड़ा था। लोगों का मानना था कि उस घर से रात के वक्त अजीब आवाजें आती हैं। कोई चीख, कोई कराह, कभी पायल की छनक।
राहुल, जो भूत-प्रेत पर बिल्कुल विश्वास नहीं करता था, दोस्तों की चुनौती पर रात को उस घर में जाने का फ़ैसला करता है।
अंदर जाते ही अंधेरा और सड़ांध उसकी नाक में घुस गई। टॉर्च की रोशनी में टूटी खिड़कियाँ, जाले और पुरानी तस्वीरें टंगी दिखीं। एक तस्वीर में औरत का चेहरा इतना साफ था कि लगा अभी पलक झपकाएगी।
अचानक ऊपर की मंज़िल से ठक… ठक… ठक… की आवाज़ आई। राहुल डरते-डरते सीढ़ियाँ चढ़ा। कमरा आधा खुला था। उसने दरवाज़ा धकेला—
भीतर कुर्सी पर वही औरत बैठी थी जिसकी तस्वीर नीचे लगी थी। उसके गले से रस्सी लटक रही थी, और चेहरा बिल्कुल उसकी ओर घूर रहा था।
राहुल चीखना चाहता था, मगर आवाज़ गले में ही अटक गई। तभी वह औरत धीमे-धीमे बोली—
“इतने साल बाद… कोई आया…”
और अगले ही पल दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया। बाहर खड़े उसके दोस्तों ने राहुल की चीख सुनी, लेकिन जब दरवाज़ा तोड़ा—अंदर सिर्फ़ टूटी कुर्सी और झूलती रस्सी थी।
राहुल फिर कभी दिखाई नहीं दिया।


