कमरे नंबर 313 – लक्ष्मी जायसवाल

“सिर्फ एक रात है। सुबह निकल जाऊँगा,” राज ने खुद से कहा। वह देर रात मसूरी पहुँचा था और होटल में सिर्फ एक कमरा खाली था—कमरा नंबर 313।

रिसेप्शन पर बैठे बूढ़े आदमी ने एक अजीब-सी निगाह डाली—
“इस कमरे में… पहले भी लोग ठहरे हैं। पर…”

राज ने हँसते हुए कहा, “डराने की ज़रूरत नहीं है, मैं लेखक हूँ। कहानियाँ डरावनी होनी चाहिए, असल ज़िंदगी नहीं।”



रात 12:07 बजे

राज लिखने बैठा।

तभी दरवाज़ा खटखटाया।

जब खोला—कोई नहीं।

किरकिराती आवाज़ में किसी ने उसके कान के पास फुसफुसाया:
“तुम आ गए…”

वो पलटा। कोई नहीं।


रात 1:13 बजे

कमरे की बत्ती अपने आप बंद हो गई।

लैपटॉप स्क्रीन पर एक फाइल अपने आप खुल गई।

नाम था—”313.docx”

फाइल में सिर्फ एक लाइन टाइप हुई:

“अब तुम भी नहीं बचोगे…”


राज काँप गया। लैपटॉप उसने बंद किया, बैग उठाया, पर दरवाज़ा बंद था… अंदर से नहीं, बाहर से।


रात 3:13 बजे

राज को खिड़की में किसी का चेहरा दिखा।

वही जो “313.docx” फाइल में देखा था—एक औरत, गर्दन उल्टी मुड़ी हुई, आँखें फटी-फटी।

वह धीरे-धीरे दीवार पर चढ़कर छत से लटक गई… और हँसने लगी।

“अब तुम मेरी कहानी का हिस्सा बन चुके हो।”


सुबह 6:00 बजे

होटल स्टाफ ने दरवाज़ा तोड़ा।

कमरा खाली था।

राज का बैग वहीं था, उसका लैपटॉप भी… लेकिन उसमें अब सिर्फ एक नया फ़ोल्डर था:
“Next Guest”

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