पीपल के पेड़ वाली आत्मा — लक्ष्मी जायसवाल

यह कहानी रमेश यादव नाम के व्यक्ति की है, जो रेलवे में गार्ड की नौकरी करते थे। उन्हें अक्सर रात की ड्यूटी में लोकल ट्रेनों के साथ जाना पड़ता था। एक बार उन्हें एक छोटे स्टेशन के पास रात 2 बजे की ड्यूटी मिली।

रात के करीब 2:30 बजे रमेश जी की ट्रेन एक छोटे से स्टेशन पर रुकी, जो घने जंगलों और खेतों के बीच था। ठंडी हवा, कोहरा और चारों ओर सन्नाटा।

उन्हें अचानक शौच के लिए जाना पड़ा। स्टेशन से थोड़ा दूर एक पुराना पीपल का पेड़ था। वहाँ अक्सर लोग नहीं जाते थे, क्योंकि गांव में माना जाता था कि उस पेड़ पर एक औरत की आत्मा रहती है, जो सफेद साड़ी में दिखती है और लोगों को अपने साथ बहका ले जाती है।

रमेश जी को इन बातों पर यकीन नहीं था। उन्होंने टॉर्च उठाई और उस दिशा में चले गए।

जैसे ही वे पास पहुँचे, उन्हें एक औरत की सिसकी सुनाई दी। सफेद कपड़ों में एक महिला पीपल के पेड़ के नीचे बैठी थी। उन्होंने पूछा,

“मैडम, आप इतनी रात को यहाँ क्या कर रही हैं?”

औरत ने सिर झुकाए-झुकाए कहा:

“मुझे घर जाना है… लेकिन रास्ता नहीं मिल रहा…”

जैसे ही रमेश जी ने उसका हाथ पकड़कर उठाने की कोशिश की — उसकी हड्डियाँ बर्फ जैसी ठंडी थीं।

टॉर्च की रोशनी उस औरत के चेहरे पर पड़ी और रमेश जी की सांसें थम गईं। उसकी आंखें पूरी सफेद थीं, पलकें नहीं थीं, और उसका चेहरा जले हुए मांस की तरह था। उसके पैरों की दिशा उलटी थी।

रमेश जी डर के मारे गिर पड़े। जब उन्हें होश आया, तो वो रेलवे स्टेशन पर बेंच पर पड़े थे। स्टेशन मास्टर ने बताया कि कुछ मजदूरों ने उन्हें पेड़ के पास बेहोश पाया था।

रमेश जी ने उसके बाद कभी रात की ड्यूटी नहीं ली… और आज भी उस स्टेशन पर रात में कोई पीपल के पास नहीं जाता।

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