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रात का दरवाजा — सतीश कुमार

“रात का दरवाज़ा”

शालिनी एक सरकारी स्कूल में टीचर थी।नई जगह पर जॉइन करने के बाद उसे सरकारी क्वार्टर मिला — पुराना, टूटा-फूटा सा घर, चारों तरफ पेड़-पौधों से घिरा हुआ। सबने कहा, “मैडम, रात में चौखट वाला दरवाज़ा मत खोलना… वो कमरा बंद ही रहने दो।”शालिनी हँस दी — “भूत-प्रेत जैसी बातें मत करो।”पहली रात ठीक रही।दूसरी रात को दरवाज़े के उस पार ठक-ठक-ठक की आवाज़ आई।वो डर गई, पर झाँकने की हिम्मत नहीं की।तीसरी रात, वही आवाज़ फिर आई — इस बार ज़ोर से, जैसे कोई भीतर आना चाहता हो!वो धीरे से उठी, टॉर्च लेकर दरवाज़े की तरफ बढ़ी।दरवाज़े के नीचे से किसी की परछाई दिख रही थी — लेकिन बाहर कोई नहीं था।हवा नहीं थी, फिर भी दरवाज़ा हल्का-हल्का हिल रहा था।अगले दिन उसने चौकीदार से पूछा, “ये कमरा बंद क्यों है?”वो बोला,“मैडम, उस कमरे में पहले एक और टीचर रहती थीं… बरसों पहले।एक रात दरवाज़ा बंद नहीं किया था…सुबह बस उनका जूता और खून के निशान मिले।”शालिनी के रोंगटे खड़े हो गए।उस रात उसने दरवाज़े के सामने दीया रखकर पूजा की और सो गई।आधी रात को फिर ठक-ठक-ठक…इस बार आवाज़ के साथ किसी की धीमी हँसी भी आई।वो डर से काँपते हुए बोली, “कौन है वहाँ?”धीरे-धीरे दरवाज़ा खुद-ब-खुद खुल गया।अंदर अँधेरा था, पर दीए की लौ अचानक बुझ गई।और उसने देखा — सामने खड़ी थी वही औरत,सफेद साड़ी में, जली हुई शक्ल के साथ…धीरे-धीरे आगे बढ़ती हुई बोली “अब तुम मेरी जगह रहोगी…”सुबह चौकीदार ने दरवाज़ा खोला —कमरा खाली था,पर दीवार पर लिखा था —“शालिनी अब कभी नहीं जाएगी।”

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