पीपल की छाँव

_लक्ष्मी जायसवाल

पीपल की छाँव तले मत जाना,
बूढ़े लोग बार-बार समझाते थे।
वो कहते—दिन में पेड़, रात में क़ैदखाना,
जहाँ साया नहीं, बस सज़ा आती है।

चौदह साल की थी रमा,
जो खेलते-खेलते चली गई थी दूर,
उसने सुना था एक नाम बार-बार,
“रमा… रमा…” पेड़ से आती आवाज़।

कहते हैं उस रात कोई चाँद नहीं निकला,
हवा भी रुकी रही साँसों की तरह।
पेड़ की जड़ों से निकलीं दो सफेद बाँहें,
और फिर रमा कभी घर नहीं लौटी।

अब हर अमावस की रात,
पेड़ के नीचे एक लड़की हँसती है,
उसकी हँसी में दर्द नहीं—भूख है,
रूह की भूख, जो अब मिटती नहीं।

जो भी पास जाता है,
उसका नाम रमा की जुबान पर चढ़ जाता है।
और फिर एक और आत्मा,
उस पेड़ की शाखों में उलझ जाती है।

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