गंगा की पुकार
वाराणसी के घाट पर हर शाम की तरह आरती हो रही थी। ढेरों दीपक गंगा की लहरों पर तैर रहे थे। लेकिन उसी भीड़ में आरव अकेला खड़ा था, जैसे किसी को ढूँढ रहा हो।
पिछले महीने उसकी मंगेतर आकृति अचानक गंगा में बह गई थी। लोग बोले—“नाव पलट गई थी।” लेकिन आरव को यक़ीन था, उसने आकृति को खुद गंगा में उतरते देखा था, जैसे किसी अदृश्य हाथ ने उसे खींच लिया हो।
उस रात, आरव अकेला गंगा किनारे बैठा। चारों ओर सन्नाटा था, बस लहरों की आवाज़। अचानक, उसे गंगा के पानी से फुसफुसाहट सुनाई दी—
“आरव… आ जाओ…”
उसका दिल धड़क उठा। वह जानता था, यह आकृति की आवाज़ है।
धीरे-धीरे वह पानी के करीब गया। लहरों में उसे आकृति का चेहरा दिखा—भीगा हुआ, आँखें खाली, होंठ मुस्कुराते हुए।
“तुम यहाँ हो?” आरव काँपते हुए बोला।
चेहरे ने कहा—“हाँ… मेरे पास आओ… गंगा में उतर जाओ… हमेशा के लिए…”
आरव जैसे सम्मोहित होकर पानी में उतरने लगा। तभी पीछे से एक बूढ़ा साधु ने उसका हाथ पकड़ लिया। साधु चिल्लाया—
“मत जाओ! यह गंगा माँ की आत्मा नहीं, प्यासे प्रेतों की पुकार है। हर साल सैकड़ों लोग इसी तरह बहा लिए जाते हैं।”
आरव ने पीछे देखा, लेकिन पानी में आकृति का चेहरा अब खोपड़ी बन चुका था, जो उसे अंदर खींचने की कोशिश कर रहा था।
साधु ने मंत्र पढ़ते हुए गंगा का जल उसके माथे पर छिड़का। वह चेहरा अचानक चीख़ता हुआ गहराई में डूब गया।
आरव बच गया।
लेकिन उस दिन के बाद, जब भी वह गंगा किनारे जाता, उसे पानी से वही आवाज़ सुनाई देती—
“आरव… आ जाओ…”


