काली स्याही — पवन मिश्रा


रायपुर के छोटे से कस्बे में रहने वाली लेखिका नंदिनी रात-रातभर अपनी कहानियाँ लिखती थी। उसे विश्वास था कि डरावनी कहानियाँ लिखते-लिखते वह देश की सबसे बड़ी हॉरर राइटर बनेगी।

एक दिन उसे बाज़ार में एक अजीब-सी पुरानी स्याही की दवात मिली। दुकानदार ने चेतावनी दी—
“इसे मत लेना, इसमें लिखा हर शब्द ज़िंदा हो जाता है।”

लेकिन नंदिनी ने हँसकर दवात खरीद ली।

उस रात उसने नई कहानी लिखनी शुरू की। जैसे ही उसने दवात में कलम डुबोकर पहला वाक्य लिखा—
“कमरे में एक काला साया खड़ा था…”

तभी कमरे के कोने से सचमुच एक काला साया हिलने लगा।

वह डर गई, लेकिन सोचने लगी—
“शायद मैं थक गई हूँ, नज़र का धोखा है।”

उसने लिखना जारी रखा—
“उस साए ने धीरे-धीरे आगे कदम बढ़ाए…”

अचानक उसके कमरे का दरवाज़ा अपने आप बंद हो गया और वही काला साया उसकी ओर बढ़ने लगा।

नंदिनी के हाथ से कलम गिर गई। लेकिन साया तभी रुका, जब उसने आख़िरी वाक्य अधूरा छोड़ दिया।

सुबह अख़बार में खबर आई—
“लेखिका नंदिनी अपनी ही लिखी कहानी में गुम हो गई… उसके कमरे में सिर्फ़ खून से सनी दवात और अधूरी पांडुलिपि मिली।”

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