कहानी का नाम – चिरिकुन्नी, लेखक शुभ्रांशु राउत

यह कहानी ओडिशा के एक छोटे से गाँव देउलबाद की है। यह गाँव शहर से थोड़ा दूर था। गाँव में ज़्यादा लोग नहीं रहते थे और सभी खेती-बाड़ी करके अपना जीवन यापन करते थे। गाँव के लोग भूत-प्रेत और रहस्यमयी बातों पर बहुत विश्वास करते थे।गाँव के लोग कहते थे कि वहाँ रात के समय एक चिरुकुन्नी घूमती और रोती रहती है। जो भी उसके सामने आ जाता, वह उसे मार देती थी। चिरुकुन्नी एक प्रकार की डायन होती है। माना जाता था कि जो औरत गर्भावस्था में किसी कारण से मर जाती है, वह चिरुकुन्नी बन जाती है। इसी डर से कोई भी गाँव में देर रात बाहर नहीं निकलता था।आदित्य लगभग 25–26 साल का युवक था। उसकी पढ़ाई पूरी हो चुकी थी। घरवाले उसे कहते रहते थे,“बेटा, कहीं नौकरी कर लो और शादी कर लो। घर में एक बहू आएगी तो अच्छा होगा।”आदित्य चाहता था कि वह अपनी मर्ज़ी से शादी करे, लेकिन अब तक उसकी ज़िंदगी में कोई नहीं आई थी। वह नौकरी और प्यार—दोनों की तलाश में था।अरुणा, देउलबाद गाँव का ही रहने वाला था, उम्र लगभग 29–30 साल। उसकी अब तक शादी नहीं हुई थी और वह अपने पिता की खेती-बाड़ी में मदद करता था। अरुणा, आदित्य का मौसी का बेटा था।बहुत दिनों बाद आदित्य अपनी मौसी के घर गया। पढ़ाई के कारण वह पहले नहीं जा पा रहा था। अब जब पढ़ाई पूरी हो चुकी थी, तो एक दिन उसने अपनी माँ से कहा,“माँ, मुझे मौसी के घर जाना है। मौसा-मौसी और अरुणा से मिले हुए बहुत दिन हो गए हैं।”पहले माँ तैयार नहीं हुई, लेकिन आदित्य की ज़िद के आगे मान गई। आदित्य शहर से बस पकड़कर चल पड़ा। रात लगभग 9 बजे वह बस से उतरा और पैदल मौसी के घर पहुँचा। वहाँ सभी ने उसका स्वागत किया। मौसी ने पूछा,“बेटा, रास्ते में कोई परेशानी तो नहीं हुई?”आदित्य को बस से उतरकर चलते समय कुछ अजीब सा लगा था, लेकिन उसने किसी को कुछ नहीं बताया।एक दिन आदित्य और अरुणा गाँव में घूम रहे थे। तभी आदित्य की नज़र एक ऐसी लड़की पर पड़ी, जो चाँद से भी ज़्यादा उजली और बेहद सुंदर थी—मानो किसी देश की राजकुमारी हो। आदित्य उससे नज़रें हटा ही नहीं पाया।कुछ दिनों बाद उसने उस लड़की को फिर देखा। वह उसके पास जाना चाहता था, लेकिन हिम्मत नहीं हो रही थी। फिर भी वह उसके पीछे-पीछे गया और आखिरकार पूछ ही लिया,“तुम्हारा नाम क्या है?”लड़की कुछ देर चुप रही, फिर बोली,“मेरा नाम मधु है। आपको मुझसे कुछ काम है क्या?”आदित्य ने कहा,“नहीं… बस ऐसे ही पूछ लिया।”धीरे-धीरे दोनों बात करने लगे और उनकी बातें प्यार में बदल गईं। वे रोज़ मिलना और बातें करना चाहते थे, लेकिन गाँव के लोग उन्हें शक की नज़र से देखने लगे थे, क्योंकि गाँव में प्यार को गलत माना जाता था।इसलिए दोनों ने तय किया कि जब पूरा गाँव सो जाएगा, तब वे मिलेंगे। कुछ दिनों तक ऐसा ही चलता रहा। कभी आदित्य चुपके से मधु को बुलाता, तो कभी मधु आदित्य को।एक दिन अमावस्या की रात थी। मधु गाँव की लड़की थी और भूत-प्रेत की बातों पर विश्वास करती थी। उसने चिरुकुन्नी के बारे में भी सुना था। उसने आदित्य से कहा,“आज अमावस्या है, आज हम नहीं मिलेंगे। आज भूत-प्रेत और पिशाचों की ताकत दोगुनी हो जाती है।”आदित्य नहीं मानना चाहता था, लेकिन मधु के बार-बार कहने पर मान गया।उस रात आदित्य अरुणा के पास सोया, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी। उस जगह न तो बिजली ठीक से थी और न ही इंटरनेट। जहाँ वह सो रहा था, वहाँ एक खिड़की थी। अचानक उसे किसी के बुलाने की आवाज़ आई।“कौन है? मधु… तुम हो क्या?”आवाज़ आई, “हाँ आदित्य, बाहर आओ।”आदित्य प्यार में पागल था। वह चुपके से बाहर निकल गया। वह आवाज़ किसी सम्मोहन जैसी थी। वह खिंचता चला गया। कुछ दूर चलने के बाद उसे होश आया और उसने खुद को एक सुनसान जगह पर पाया।चारों ओर कोई नहीं था। तभी उसे दूर एक परछाईं दिखी। वह वहाँ गया, लेकिन कोई नहीं मिला। डर लगने लगा। तभी उसने देखा—एक पीपल के पेड़ पर कोई बैठकर लोरी गा रहा था, वही लोरी जो माँ अपने बच्चे को सुनाती है।आदित्य कुछ समझ पाता, उससे पहले ही वह आकृति अचानक छलांग लगाकर उलटी दिशा में उसकी ओर आने लगी। यह देखकर आदित्य डर के मारे जम गया। फिर वह जान बचाकर भागने लगा। बहुत दूर जाने के बाद उसने पीछे देखा—कोई नहीं था।तभी उसने पास में एक मिट्टी का घर देखा। वहाँ एक औरत आग जलाकर बैठी थी। उसकी पोशाक से वह एक सामान्य स्त्री लग रही थी। उसकी गोद में एक बच्चा था, जिसका मुँह ढका हुआ था।आदित्य ने पूछा,“आप इतनी रात को बच्चे को लेकर यहाँ क्यों बैठी हैं?”औरत ने सिर हिलाया।आदित्य बोला,“छोटे बच्चों का शरीर बहुत नाज़ुक होता है।”औरत बोली,“तुम्हारा शरीर भी बहुत नाज़ुक है।”आदित्य कुछ समझ नहीं पाया। वह बहुत थक चुका था। उसने घर में आराम करने की बात कही और उठने लगा। तभी उस औरत ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसका हाथ बिल्कुल सामान्य नहीं था—डायन जैसा।आदित्य ने देखा कि उसकी गोद में जो बच्चा था, वह अब कंकाल बन चुका था। तभी उस औरत ने अपना चेहरा दिखाया। उसका चेहरा सड़ा हुआ था, आँखों से खून बह रहा था।यह देखकर आदित्य बेहोश हो गया।सुबह जब उसकी आँख खुली, उसने देखा कि वहाँ भीड़ जमा है। वह आगे बढ़ा और देखा—भीड़ के बीच कोई और नहीं, वह खुद मरा हुआ पड़ा था।

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