एक भयानक रात

—सिद्दीकी रुखसाना

एक भयानक रात

अब्बा जान मैं जन्नत से बोल रही हूं,
मैं आप की प्रिय बेटी लाडो बोल रही हूँ।

के बीत रही थी ज़िंदगी मेरी भी,
खुशहाल मेरे अब्बा जान,
के आईं एक भयानक रात जो,
ले गई साथ मेरी खुशियों की बारात।

क्या कसूर था मेरा जो ली थी,
ज़ालिमों ने मेरी जान,
के आज भी भटक रही है,
मेरी आत्मा समाज में दिन रात।

मैं आत्मा बुरी नहीं ,
बल्कि रक्षक हु नारी की,
भक्षक की काल हूँ ,
जी हां मैं आत्मा खूंखार हूँ ।

मेरा कार्य केवल समाज में
अत्याचार को रोकना ही नहीं
बल्कि अन्याय को न्याय दिलाना
समाज का कल्याण करना है

जो कार्य मैं जीते जी न कर सकी ,
वो आत्मा के रूप में पूर्ण कर रही हूं ,
क्योंकि मैं आत्मा बुरी नहीं हूँ ,
शिक्षिका होने का फर्ज़ निभा रही हूँ ।

मेरा बदला अब भी अधूरा था ,
क्योंकि ज़ालिमो का चेहरा धुंधला था,
लूंगी पुनरजन्म धरती पर जो
करुंगी खात्मा उन जालिमों का हर बार ।


जी हां मेरे प्यारे,
अब्बा जान मैं जन्नत से बोल रही हूँ
मैं आप की प्रिय बेटी लाडो बोल रही हूँ,

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