अधूरी प्रार्थना —पल्लवी झा


रात का समय था। पहाड़ी पर बने प्राचीन मंदिर में शांति पसरी हुई थी। कहा जाता था कि यहाँ आधी रात को प्रार्थना करने वाला कभी घर वापस नहीं लौटता।
आरव, एक शोध छात्र, इस रहस्य को जानने के लिए मंदिर पहुँचा। उसकी जेब में टॉर्च और नोटबुक थी।

ज्यों ही उसने मंदिर का दरवाज़ा खोला, वहाँ ठंडी हवा का झोंका आया। धूप और अगरबत्ती की महक के बीच उसे किसी के बुदबुदाने की आवाज़ सुनाई दी।
वह आगे बढ़ा तो देखा—दीवार पर परछाई थी, लेकिन वहाँ कोई इंसान खड़ा नहीं था।

“मंत्र पूरा करो…” आवाज़ आई।

आरव काँप उठा। उसकी नज़र फर्श पर पड़ी प्रार्थना-पुस्तिका पर गई। आधा लिखा हुआ श्लोक उसके सामने खुला था।
उसने काँपते हाथों से पढ़ना शुरू किया।

ज्यों ही आखिरी शब्द उसने बोल दिए—दीवार पर उभरता चेहरा भयानक रूप ले चुका था। उसकी आँखों से खून बह रहा था।

“अब मेरी प्रार्थना पूरी हुई… और अब तू मेरा है।”

आरव की चीख रात की खामोशी में गुम हो गई। सुबह लोगों ने मंदिर में सिर्फ उसकी नोटबुक पाई—आखिरी पन्ने पर लिखा था:
“प्रार्थना कभी अधूरी मत छोड़ना।”

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