अंधेरी रात — निमिलिका

रात घनी थी, बादल छाए,
दूर कहीं कुत्ते थे भौंकाए।

पेड़ों से गिरती पत्तियाँ,
जैसे हों भूतों की बातियाँ।

टूटा मकान, चरमराया,
दरवाज़ा अपने आप हिलाया।

दीवार पर छाया लहराई,
चुपके-चुपके नज़दीक आई।

पाँवों के नीचे ज़मीन काँपी,
हवा ने ठंडी सांसें झांकी।

कोई फुसफुसा कान के पास,
“भाग नहीं पाएगा इस रात खास।”

दीपक बुझा, अँधेरा गाढ़ा,
दिल में डर का बढ़ा पहाड़ा।

लाल चमकती दो आँखें दिखीं,
रगों में जैसे बिजली उतरीं।

कदम मेरे जड़ हो गए,
जैसे भूत सच में खड़े हो गए।

सन्नाटा अब चीख बना,
आत्मा ने मुझको जकड़ लिया।

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